दरसन देखत ही सुधि की न सुधि रही-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

दरसन देखत ही सुधि की न सुधि रही-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

दरसन देखत ही सुधि की न सुधि रही
बुधि की न बुधि रही मति मै न मति है ।
सुरति मै न सुरति अउ ध्यान मै न ध्यानु रहओ
ग्यान मै न ग्यान रहयो गति मै न गति है ।
धीरजु को धीरजु गरब को गरबु गइओ
रति मै न रति रही पति रति पति मै ।
अदभुत परमदभुत बिसमै बिसम
असचरजै असचरज अति अति मै ॥९॥

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