दरसनाए पैग़म्बरे ख़ुदा- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

दरसनाए पैग़म्बरे ख़ुदा- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ।

तेरा दोस्त है वह जो ख़ेरुलवरा ।
मुहम्मद नबी मालिके दोसरा ।
कहाँ वस्फ़ हो मुझ से उसका अदा ।
व लेकिन है मेरी यही इल्तिजा ।
ज़बाँ ताबुवद दर दहाँ जाए गीर ।
सनाऐ मुहम्मद बुवद दिल पज़ीर ।

वह शाहे दो आलम अमीरे उमम ।
बने वास्ते जिसके लौहो-क़लम ।
सदा जिसके चूमें मलायक क़दम ।
करूँ उसका रुतबा मैं क्यूँकर रक़म ।
हबीबे ख़ुदा अशरफ़ुल अंम्बिया ।
कि अर्शे मजीदश बुवद मुत्तक़ा ।

अगर्चे यह पदा हुआ ख़ाक पर ।
गया ख़ाक से फिर वह इफ़लाक पर ।
मेरा जी फ़िदा उस तने पाक पर
तसद्दुक़ हूँ मैं उसके फ़ितराक पर ।
सवारे जहाँ गीर यकराँ बुराक़ ।
कि बगज़श्त अज़ करने नीली-ए-खाक़ ।

Leave a Reply