थोड़े से पैसों में-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

थोड़े से पैसों में-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

थोड़े से पैसों में बहुत कुछ मिलता है
आवाज़ परवाज़ और अंदाज़।

पैरों पर मिट्टी थाप कर कच्चा घर बना सकते हो।
नन्ही-सी शहनशाही के लिए
सरकंडे का दरबान खड़ा कर सकते हो
घास के तिनकों के झुमके,
छल्ले मुँदरियाँ और दूसरा गहना गट्टा।
महबूब के लिए बिना माप बना सकते हो।
इस उम्र में कमदस्ती के मारे घरों के
बेटी बेटों का माप कौन जानता है?
फटे पुराने कपड़ों से गेंद और चावों के बेल बूट्टे
बड़ी बहन से बनवा सकते हो।

मस्ती में आकर लम्बा आलाप भर सकते हो।
थाली को साज़ बना सकते हो।
सुर और ताल के साथ अंबर गाहते
ख़्वाबों जैसे तारे तोड़ सकते हो।
स्वप्न-शहजादी के बालों में
टाँक सकते हो कहकशां
माथे पर चाँद का टिक्का टिका सकते हो
थोड़े से पैसों में।

रात में सोने के समय तारे गिन सकते हो।
अभिलाषाओं को कह सकते हो जागते रहना,
मैं सोने चला।
सवेरे फिर मिलेंगे सूरज उगते।
किरणों का झुरमुट थोड़े से पैसों में
बहुत कुछ खरीद सकते हो।

यदि पास में कुछ नहीं तो
दीवार पर लकीरें खींच औसिया* डाल सकते हो।
अच्छे समय की प्रतीक्षा में।
अपनी छाँव में चल सकते हो
किसी की परछाई बने बगैर।

मनभावनी तस्वीर से बातें कर सकते हो।
बिन बुलाए हुँकारी भर सकते हो।
बहते पवन को संदेशा दे सकते हो,
आहों को डाकिया बना सकते हो।
पवन के कमर में करधनी बाँध सकते हो।
सपनों को रंगों में बदल सकते हो।

जाड़े की धूप का आनंद ले सकते हो
खाली पेट बजा सकते हो
साज़ की तरह सुर कर सकते हो
मन वचन और कर्म।

पैदल चलते घास पर पड़े
ओस-मुक्ता चुन सकते हो।
चिड़िया की चहचहाट में से
भूख के गीत का तर्ज़ तलाश सकते हो।

किसी दानवीर की ओर राह में लगवाई
नन्ही रहट गेड़ सकते हो
चना चबाते रहट की नाली से अँजुरी भरकर
पानी पी सकते हो।
शिरीष की छाँव में सोने के बजाय
जागते हुए टहनियों के झरोखों से
रोटी के गोल पहिए जैसा
लुढ़कता सूरज देख सकते हो।
इसके सुर्ख रंग को सपनों में भर सकते हो।

मँहगा हो गया है बाज़ार
अपना संसार स्वयं गढ़ो।
आपस में नहीं मँहगे बाज़ार से लड़ो।

नंगे धड़ और कुछ नहीं तो
दाँत पीसा जा सकता है।
झूठ की दूकान से सौदा खरीदने से
मन मोड़ा जा सकता है।
बहकावों और नारों में
खोट परखी जा सकती है।
हवाई किलों की नीवें
खँगाली जा सकती हैं।
दर्दों के संगी साथी को
गलबाँहें डाल सकते हो।
बरसात में नहाते
मेघ मल्हार गा सकते हो।
फटी बिवाइयों वाले पैरों में
चावों की झाँझर पहन
मन के बाग में मोर नचा सकते हो।
बहुत कुछ कर सकते हो।
हताश ढह कर बैठे
रात खा जाती है समूचा वजूद।
पी जाती है बतासों-सा घोल घोल कर
किलकारियाँ
कर देती है धूप मटमैली।
झाड़ देती है वृक्षों के पात
छाँव चितकबरी कर देती है सत्ता की आँधी।

अपना आपा इकट्ठा करो।
तिनका तिनका जोड़ो साथ जीओ साथ मरो।
ज़मीनों के रखवालों!
थोड़े से पैसो में, ज़मीर न बिकने दो।

*एक तरीका जिसमें लोग लकीरें खींच कर
किसी बात का अंदाज़ा लगा लेते हैं।

 

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