थोड़ी अनगढ़ रहने दो-अलका सोनी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Alka Soni,

थोड़ी अनगढ़ रहने दो-अलका सोनी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Alka Soni,

मत तरासो इतना
थोड़ी अनगढ़ ही
रहने दो
ऊब गई रहकर
महलों में
अब ताप भी थोड़ा
सहने दो

अलंकारों का यह
बोझ उतारो
उन्मुक्त गगन में
उड़ने दो
नर ही रहे
तुम तो सदैव
मुझ को भी
नारी ही रहने दो

रख लो अपनी
पूजन सामग्री
और न देवी बनने दो
इंद्रधनुष से इस
जीवन में स्वयं
सप्त रंग
मुझे भरने दो

दुर्गा ,लक्ष्मी ,काली की
ये उपमाएं
तुम बस यह
अब रहने दो
मुझ में है वाणी
मूक नहीं मैं
प्रखर प्रवाह
बन मुझे बहने दो।

 

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