थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं
जो खो गये हैं या रब वो औसाँ कहाँ हैं
आँखों में रोते-रोते नम भी नहीं अब तो
थे मौजज़न जो पहले वो तूफ़ाँ कहाँ हैं

कुछ और ढब अब तो हमें लोग देखते हैं
पहले जो ऐ “ज़फ़र” थे वो इन्साँ कहाँ हैं

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