थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुंदरि काइआ-शब्द-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji

थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुंदरि काइआ-शब्द-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji

थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुंदरि काइआ ॥
जरा हाक दी सभ मति थाकी एक न थाकसि माइआ ॥१॥
बावरे तै गिआन बीचारु न पाइआ ॥
बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
तब लगु प्रानी तिसै सरेवहु जब लगु घट महि सासा ॥
जे घटु जाइ त भाउ न जासी हरि के चरन निवासा ॥२॥
जिस कउ सबदु बसावै अंतरि चूकै तिसहि पिआसा ॥
हुकमै बूझै चउपड़ि खेलै मनु जिणि ढाले पासा ॥३॥
जो जन जानि भजहि अबिगत कउ तिन का कछू न नासा ॥
कहु कबीर ते जन कबहु न हारहि ढालि जु जानहि पासा ॥४॥४॥793॥

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