थर्ड वर्ल्ड-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

थर्ड वर्ल्ड-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

जिस बस्ती में आग लगी थी कल की रात
उस बस्ती में मेरा कोई नहीं रहता था,
औरतें बच्चे, मर्द कई और उम्र रसीदा लोग सभी , वो
जिनके सर पे जलते हुए शहतीर गिरे
उनमें मेरा कोई नहीं था ।
स्कूल जो कच्चा पक्का था और बनते बनते खाक हुआ
जिसके मलबे में वो सब कुछ दफ़न हुआ जो उस बस्ती का
मुस्तक़बिल कहलाता था
उस स्कूल में-
मेरे घर से कोई कभी पढ़ने न गया न अब जाता था
न मेरी दुकान थी कोई
न मेरा सामान कहीं ।
दूर ही दूर से देख रहा था
कैसे कुछ खुफ़िया हाथों ने जाकर आग लगाई थी ।।
जब से देखा है दिल में ये खौफ बसा है
मेरी बस्ती भी वैसी ही एक तरक्की करती बढ़ती बस्ती है
और तरक्कीयाफ़्ता कुछ लोगों को ऐसी कोई बात पसंद नहीं।।

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