त्रिभंगिमा -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

त्रिभंगिमा -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

जाल समेटा

जाल-समेटा करने में भी
समय लगा करता है, माझी,
मोह मछलियों का अब छोड़ ।

सिमट गई किरणें सूरज की,
सिमटीं पंखुरियां पंकज की,
दिवस चला छिति से मुंह मोड़ ।

तिमिर उतरता है अंबर से,
एक पुकार उठी है घर से,
खींच रहा कोई बे – डोर ।

जो दुनिया जगती, वह सोती;
उस दिन की संध्या भी होती,
जिस दिन का होता है भोर ।

नींद अचानक भी आती है,
सुध-बुध सब हर ले जाती है,
गठरी में लगता है चोर ।

अभी क्षितिज पर कुछ-कुछ लाली,
जब तक रात न घिरती काली,
उठ अपना सामान बटोर ।

जाल-समेटा करने में भी
वक्त लगा करता है, माझी,
मोह मछलियों का अब छोड़ ।

मेरे भी कुछ कागद – पत्रे,
इधर-उधर हैं फैले – बिखरे,
गीतों की कुछ टूटी कड़ियां,

कविताओं की आधी सतरें,
मैं भी रख दूँ सबको जोड़ ।

जब नदी मर गई-जब नदी जी उठी

कौन था वह युगल
जो गलती-ठिठुरती यामिनी में
जबकि कैम्ब्रिज
श्रांत,विस्मृत-जड़ित होकर
सो गया था
कैम के पुल पर खड़ा था–
पुरुष का हर अंग
प्रणयांगार की गर्मी लिए
मनुहार-चंचल,
और नारी फ्रीजिडेयर से निकली,
संगमरमर मूर्ति-सी
निश्चेष्ट,
निश्चल
घड़ी ट्रिनिटी की
अठारह बार बोली,
युगल ने
छत्तीस की मुद्रा बना ली;
और तारों से उतर कुहरा

 टूटे सपने

—और छाती बज्र करके
सत्य तीखा
आज वह
स्वीकार मैंने कर लिया है,
स्वप्न मेरे
ध्वस्त सारे हो गए हैं!
किंतु इस गतिवान जीवन का
यही तो बस नहीं है
अभी तो चलना बहुत है,
बहुत सहना, देखना है

अगर मिट्टी से
बने ये स्वप्न होते,
टूट मिट्टी में मिले होते,
ह्रदय में शांत रखता,
मृत्तिका की सर्जना-संजीवनी में
है बहुत विश्वास मुझको
वह नहीं बेकार होकर बैठती है
एक पल को,
फिर उठेगी

अगर फूलों से
बने ये स्वप्न होते
तो मुरझाकर
धरा पर बिखर जाते,
कवि-सहज भोलेपन पर
मुसकराता, किंतु
चित्त को शांत रखता,
हर सुमन में बीज है,
हर बीज में है बन सुमन का
क्या हुआ जो आज सूखा,
फिर उगेगा,
फिर खिलेगा

अगर कंचन के
बने ये स्वप्न होते,
टूटते या विकृत होते,
किसलिए पछताव होता?
स्वर्ण अपने तत्व का
इतना धनी है,
वक्त के धक्के,
समय की छेड़खानी से
नहीं कुछ भी कभी उसका बिगड़ता
स्वयं उसको आग में
मैं झोंक देता,
फिर तपाता,
फिर गलाता,
ढालता फिर!

किंतु इसको क्या करूँ मैं,
स्वप्न मेरे काँच के थे!
एक स्वर्गिक आँच ने
उनको ढला था,
एक जादू ने सवारा था, रँगा था
कल्पना किरणावली में
वे जगर-मगर हुए थे
टूटने के वास्ते थे ही नहीं वे
किंतु टूटे
तो निगलना ही पड़ेगा
आँख को यह
क्षुर-सुतीक्ष्ण यथार्थ दारुण!
कुछ नहीं इनका बनेगा
पाँव इन पर धार बढ़ना ही पड़ेगा
घाव-रक्तस्त्राव सहते
वज्र छाती पर धंसा लो,
पाँव में बांधा ना जाता
धैर्य मानव का चलेगा
लड़खड़ाता, लड़खड़ाता, लड़खड़ाता

चेतावनी

भारत की यह परम्परा है–
जब नारी के बालों को खींचा जाता है,
धर्मराज का सिंहासन डोला करता है,
क्रुद्ध भीम की भुजा फड़कती,
वज्रघोष मणिपुष्पक औ’सुघोष करते है,
गांडीव की प्रत्यंचा तड़पा करती है;
कहने का तात्पर्य
महाभारत होता है,
अगर कभी झूठी ममता,
दुर्बलता,किंकर्तव्यविमूढ़ता
व्यापा करती,
स्वयं कृष्ण भगवान प्रकट हो
असंदिग्ध औ’स्वतः सिद्धा
स्वर में कहते,
‘युध्यस्व भारत.’
भारत की यह परम्परा है–
जब नारी के बालों को खींचा जाता है,
एक महाभारत होता है

तूने भारत को केवल
रेखांश और अक्षांश जाल में
बद्ध चित्रपट समझ लिया है,
जिसकी कुछ शीर्षस्थ लकीरें,
जब तू चाहे घटा-मिटाकर
अपने नक्शे में दिखला ले?

हथकडियाँ कड़कड़ा,बेड़ियों को तड़काकर,
अपने बल पर मुक्त, खड़ी
भारत माता का
रूप विराट
मदांध,नहिं तूने देखा है;
(नशा पुराना जल्द नहिं उतरा करता है
और न अपने भौतिक दृग से देख सकेगा
आकर कवि से दिव्यदृष्टि ले
पूरब,पश्चिम,दक्षिण से आ
अगम जलंभर,उच्छल फेनिल
हिंदमहासागर की अगणित
हिल्लोलित,कल्लोलित लहरें
जिन्हें अहर्निश
प्रक्षालित करती रहती हैं,
अविरल,
वे भारत माता के
पुण्य चरण हैं–
पग-नखाग्र कन्याकुमारिका-मंदिर शोभित
और पूरबी घाट,पश्चिमी घाट
उसी के पिन,पुष्ट,दृढ नघ-पट हैं
विंध्य-मेखला कसी हुई कटि प्रदेश में

ताजमहल

जाड़ों के दिन थे,दोनों बच्चे अमित अजित
सर्दी की छुट्टी में पहाड़ के कालेज से
घर आये थे,जी में आया,सब मोटर से
आगरे चलें,देखें शोभामय ताजमहल
जिसकी प्रसिद्धि सारी जगती में फैली है,
जिससे आकर्षित होकर आया करते हैं
दर्शक दुनियाँ के हर हिस्से,हर कोने से;
आगरा और दिल्ली के बीच सड़क पक्की;
दफ्तर के कोल्हू पर चक्कर देते-देते
जी ऊबा है,दिल बहलेगा,पिकनिक होगी
तड़के चलकर हम आठ बजे मथुरा पंहुचे;
मैंने बच्चों से कहा,’यही वह मथुरा है
जो जन्मभूमि है कृष्णचंद्र आनंदकंद की,
जिसके पेड़े हैं प्रसिद्ध भारत भर में!’
बच्चे बोले,’हम जन्मभूमि देखेंगे,पेड़े खाएंगे’

हम इधर-उधर हो केशव टीले पर पहुंचे,
जिसको दे पीठ खड़ी थी मस्जिद एक बड़ी;
टीले की मिट्टी हटा दी गई थी कुछ-कुछ
जिससे अतीत के भव्य, पुरातन मंदिर का
भग्नावशेष अपनी पथराई आँखों से
अन्यायों-अत्याचारों की कटु कथा-व्यथा
बतलाता था; अंकित था एक निकट पट पर-
छ: बार हिंदुयों ने यह मंदिर खड़ा किया,
छ: बार मुसलमानों ने इसको तोड़ दिया;
औरंगजेब ने अंतिम बार ढहा करके
मस्जिद चुनवा दी उस मंदिर के मलवे से-
कुछ भग्न मूर्तियों की ढेरी थी पास पड़ी,
जो खोज-खुदाई में टीले से निकली थीं ।

मानव तो क्या, शायद न समय भी कर पाए !
ओ शाहजहाँ, तूने उस जीवित काया को
कितना दुलराया, कितना सन्माना होगा,
जिसकी मुर्दा मिट्टी का यों श्रृंगार किया-
कल्पना-मृदुल, भावना-धवल पाषाणों से !
सज गई धरा, सज गया गगन का यह कोना
जमुना के तट पर अटक गया बहते-बहते
जैसे कोई टटके, उजले पूजा के फूलों का दोना !

केशव टीले पर मैंने जो कुछ देखा था
उसने मुझमें कुछ क्रोध-क्षोभ उकसाया था,
इस सुधि-समाधि ने मुझको ऐसा सहलाया,
मैं शांत हुआ मुझमें उदारता जाग पड़ी,
हर टूटे मंदिर का खंडहर ही बोल उठा
जैसे मेरे स्वर में, मन का आमर्ष हटा,
‘ओ ताजमहल के निर्माता हठधर्मी से
तेरे अग्रज-अनुजों ने जो अपराध किए,
उन सबको, मैंने तुझको देखा, माफ किया!’
जब हम लौटे, टीले की खंडित प्रतिमा से
सारी कटुता थी निकल गई, वह पहले से
अब ज्यादा सुन्दर, कोमल धी, मनमोहक थी !

यह भी देखा:वह भी देखा

गाँधी : अन्याय अत्याचार की दासत्व सहती
मूर्च्छिता-मृत जाति की
जड़ शून्यता में
कड़कड़ाती बिजलियों की
प्रबल आँधी :
ज्योति-जीवन-जागरण घन का
तुमुल उल्लास!

गाँधी : स्वार्थपरता,क्षुद्रता,संकीर्णता की
सम्प्रदायी आँधियों में,
डोलती,डिगती,उखड़ती,
ध्वस्त होती,अस्त होगी,
आस्थाओं,मान्यताओं में,
अतल आदर्श की चट्टान पर
जगती हुई लौ का
करुण उच्छ्वास!

गाँधी : बुत पत्थरों का,मूक,
मिट्टी का खिलौना,
रंग-बिरंगा चित्र,
छुट्टी का दिवस,
देशान्तरों में पुस्तकालयों को
समर्पित किये जाने के लिए
सरकार द्वारा,
आर्ट पेपर पर,प्रकाशित
राष्ट्र का इतिहास!

दानवों का शाप

देवताओं!
दानवों का शाप
आगे उतरता है!

सिंधु-मंथन के समय
जो छल-कपट,
जो क्षुद्रता,
जो धूर्तता,
तुमने प्रदर्शित की
पचा क्या काल पाया,
भूल क्या इतिहास पाया?
भले सह ली हो,विवश हो,
दानवों ने;
क्षम्य कब समझी उन्होंने?
सब प्रकार प्रवंचितों ने
शाप जो उस दिन दिया था
आज आगे उतरता है
जानते तुम थे
कि पारावार मंथन
हो नहीं सकता अकेले देव-बल से;
दानवों का साथ औ’सहयोग
चाह था इसी से
किंतु क्या सम-साधना-श्रम की व्यवस्था,
उभय पक्षों के लिए,
तुमने बनाई?
किया सोचो,
देवताओं!
जब मथानी के लिए
मन्द्र अचल तुमने उखाड़ा
और ले जाना पड़ा उसको जलधि तक
मूल का वह भीम,भारी भाग
तुमने दानवों की पीठ पर लादा
शिखर का भाग हल्का
तुम चले कर-कंज से अपने सम्भाले
दानवों की पिंडलियाँ चटकीं,
कमर टूटी,
हुई दृढ रीढ़ टेढ़ी,
खिंची गर्दन,
जीभ नीचे लटक आई,
तन पसीने से नहाया,
आँख से औ’ नाक से
लोहू बहा,
मुँह से अकरपन फेन छूटा;
औ’तुम्हारे कंज-पद की
चाप भी अंकित न हो पाई धरा पर!

और बासुकि-रज्जू
दम्मर की मथानी पर
लपेटी जब गई तब
किया तुमने दानवों को
सर्प-फन कि ओर
जिनके थप्पड़ों कि चोट
मंथन में अनवरत
झेलते वे रहे क्षण-क्षण!
और खींचा-खींच में जो
नाग-नर ने
धूम्र-ज्वाला पूर्ण शत-शत
अंधकर फुत्कार छोड़े
और फेंके
विष कालानल हलाहल के तरारे
ओड़ते वे रहे उनको
वीरता से,धीरता-गंभीरता से–कष्ट मारे:
जबकि तुमने
कंज-कर से
नागपति की पूँछ
सहलाई–दुही भर!

अन्त में जब
अमृत निकला,
ज्योति फैली,
तब अकेले
उसे पीने के लिए
षड्यंत्र जो तुमने रचा
सब पर विदित है
एक दानव ने
उसे दो बून्द चखने का
चुकाया मोल आना शीश देकर

(औ’अमृत पीकर
अमर जो तुम हुए तो
बे-पिए क्या मर गए सब दैत्य-दानव?
आज भी वे जी रहे हैं,
आज भी सन्तान उनकी
जी रही दूधों नहाती,
और पूतों और पोतों
फल रही है,बढ़ रही है.)

छल-कपट से,
क्षुद्रता से,
धूर्तता से,
सब तरह वंचित उन्होंने
शाप यह उसदिन दिया था:–

सृष्टि यदि चलती रही तो
अमृत-मंथन की जरुरत
फिर पड़ेगी!
और मंथन–
वह अमृत के
जिस किसी भी रूप की ख़ातिर
किया जाए–
बिना दो देह-दानव पक्ष के
संभव न होगा
किंतु अब से
मन्दराचल मूल का
वह कठिन,ठोस,स्थूल भारी
भाग देवों की
कमर पर,
पीठ-कंधों पर पड़ेगा,
और दानव शिखर थामे
शोर भर करते रहेंगे,
‘अमृत जिंदाबाद,जिन्दा–!’
ख़ास उनमे
अमृत पर व्याख्यान देंगे
और मंथन-काल में भी
देवतागण सर्प का मुख-भाग
पकडेंगे,
फनों की चोट खाएँगे,
जहर कि फूँक घूटेंगे,
मगर दल दानवों का
सर्प कि बस दम हिलाएंगे;
अमृत जब प्राप्त होगा
वे अकेले चाट जाएँगे

सुनो,हे देवताओं!
दानवों का शाप
आगे आज उतरा

यह विगत संघर्ष भी तो
सिंधु-मंथन की तरह था
जानता मैं हूँ कि तुमने हार धोया,
कष्ट झेला,
आपदाएँ सहीं,
कितना जहर घूँटा!
पर तुम्हारा हाथ छूँछा!
देवता जो एक–
दो बूँदें अमृत की
पान करने को,पिलाने को चला था,
बलि हुआ!
लेकिन उन्होंने
शोर आगे से मचाया,
पूँछ पीछे से हिलाई,
वही खीस-निपोर ,
काम-छिछोर दानव ,
सिंधु के सब रत्न-धन को
आज खुलकर भोगते हैं
बात है यह और
उनके कंठ में जा
अमृत मद में बदलता है,
और वे पागल नशे में
हद,हया,मरजाद
मिट्टी में मिलाकर
नाच नंगा नाचते हैं!
और हम-तुम
उस पुरा अभिशाप से
संतप्त-विजड़ित
यह तमाशा देखते हैं.

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