तेवर चालीसा -रमेशराज -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshraj Tewar-Chalisa Part 1

तेवर चालीसा -रमेशराज -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshraj Tewar-Chalisa Part 1

 

सिस्टम में बदलाव ला

सिस्टम में बदलाव ला
दुःख में सुख के भाव ला, आज व्यवस्था क्रूर है।

अंधकार भरपूर है
माना मंजिल दूर है, बढ़ आगे फिर नूर है।

मन में अब अंगार हो,
खल-सम्मुख ललकार हो, कह मत उसे ‘हुजूर है’।

अग्निवाण तू छोड़ दे
चक्रब्यूह को तोड़ दे, बनना तुझको शूर है।

अपना ले तू आग को

अपना ले तू आग को
आज क्रान्ति के राग को, जीवन हो तब ही सफल।

अपने को पहचान तू
जी अब सीना तान कर, डर के भीतर से निकल।

जग रोशन करना तुझे
रंग यही भरना तुझे, सिर्फ सत्य की राह चल।

तू बादल है सोच ले
मरु को जल है सोच ले, छाये दुःख का खोज हल।

दूर सूखों का गाँव है

दूर सूखों का गाँव है
जीवन नंगे पाँव है, टीस-चुभन का है सफर।

सिसकन-सुबकन से भरे
अविरल क्रन्दन से भरे, घायल मन का है सफर।

मरे-मरे से रंग में
बोझिल हुई उमंग में, दर्द-तपन का है सफर।

इस संक्रामक घाव की
बातें कर बदलाव की, क्यों क्रन्दन का है सफर।

उधर वही तर माल है

उधर वही तर माल है
मस्ती और धमाल है, सोता भूखे पेट तू।

महँगी चीनी-दाल है
घर अभाव का जाल है, सोता भूखे पेट तू।

आँखों में ग़म की नमी
सुख का पड़ा अकाल है, सोता भूखे पेट तू।

चुप मत बैठ विरोध कर
सिस्टम करे हलाल है, सोता भूखे पेट तू।

नैतिकता की देह पर

नैतिकता की देह पर
निर्लजता का बौर है, अजब सभ्य ये दौर है।

गिरगिट जैसे रंग में
अब नेता हर ठौर है, अजब सभ्य ये दौर है।

जो गर्दभ-सा रैंकता
वो गायक सिरमौर है, अजब सभ्य ये दौर है।

पश्चिम की अश्लीलता
निश्चित आनी और है, अजब सभ्य ये दौर है।

हारे-हारे लोग हैं,

हारे-हारे लोग हैं,
सुबह यहाँ पर शाम है, दुःख-पीड़ा अब आम है।

सब में भरी उदासियाँ
मन भीतर कुहराम है, दुःख-पीड़ा अब आम है।

लिख विरोध की तेवरी
तभी बनेगा काम है, दुःख-पीड़ा अब आम है।

तंग हाल था वो भले

तंग हाल था वो भले
बस सवाल था वो भले, पर भीतर से आग था।

कड़वा-कड़वा अब मिला
बेहद तीखा अब मिला, जिसमें मीठा राग था।

ऐसे भी क्षण हम जिये
गुणा सुखों में हम किये, किन्तु गुणनफल भाग था।

है कोई इन्सान वह
यह हमने समझा मगर, पता चला वह नाग था।

इसमें बह्र तलाश मत

इसमें बह्र तलाश मत
इसे ग़ज़ल मत बोलियो, जनक छंद में तेवरी।

इसमें किस्से क्रान्ति के
चुम्बन नहीं टटोलियो, जनक छन्द में तेवरी।

सिर्फ काफिया देखकर
यहाँ कुमति मत घोलियो, जनक छंद में तेवरी।

रुक्न और अर्कान से
मात्राएँ मत तोलियो, जनक छन्द में तेवरी।

यह रसराज विरोध है
नहीं टिकेगा पोलियो, जनक छंद में तेवरी।

इसमें तेवर आग के
यहाँ न खुश-खुश डोलियो, जनक छंद में तेवरी।

बढ़ते अत्याचार से

बढ़ते अत्याचार से
चंगेजी तलवार से, अब भारत आज़ाद हो।

पनपे हाहाकार से
फैले भ्रष्टाचार से, अब भारत आज़ाद हो।

ब्लेड चलाते हाथ हैं,
पापी पाॅकिट मार से, अब भारत आज़ाद हो।

कहते नेताजी जिसे
जन के दावेदार से, अब भारत आज़ाद हो।

जिसे विदेशी भा रहे
ऐसे हर गद्दार से अब भारत आज़ाद हो।

आज भले ही घाव हैं

आज भले ही घाव हैं
मन में दुःख के भाव हैं, बदलेंगे तकदीर को।

बहुत दासता झेल ली
अब आज़ादी चाहिए, तोड़ेंगे जंजीर को।

अजब व्यवस्था आपकी
जल का छल चहुँ ओर है, मछली तरसे नीर को।

संत वेश में बन्धु तुम
रहे आजकल खूब हो, कर बदनाम कबीर को।

जिनसे खुद का घर दुःखी
उनके दावे देखिए ‘हरें जगत की पीर को’।

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