तेवरियां( लोक-शैली ‘रसिया’) -रमेशराज -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshraj Lok-Shaili Rasiya Part 1

तेवरियां( लोक-शैली ‘रसिया’) -रमेशराज -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshraj Lok-Shaili Rasiya Part 1

बेपेंदी का लोटा, जिसका चाल-चलन है खोटा

बेपेंदी का लोटा, जिसका चाल-चलन है खोटा
उससे हर सौदे में टोटा आना निश्चित है।

जो गोदाम डकारे, जिसका पेट फूलकर मोटा
उसके हिस्से में हर कोटा आना निश्चित है।

रेखा लाँघे सीता, रावण पार करे परकोटा
इस किस्से में किस्सा खोटा आना निश्चित है।

उसकी खातिर सोटा, जिसने बाँध क्रान्ति-लँगोटा
विद्रोही चिन्तन पर ‘पोटा’ आना निश्चित है।

 

रोयें पेड़ विचारे, जैसे वधिक सामने गइया

रोयें पेड़ विचारे, जैसे वधिक सामने गइया
कुल्हाड़ी देख-देख डुगलइया थर-थर काँप रही।

वाणी डंक हजारों, पूत का जैसे रूप ततइया
उसके आगे बूढ़ी मइया थर-थर काँप रही।

मन आशंका भारी, जीवन की डगमग है नइया
बाज को आता देख चिरइया थर-थर काँप रही।

जहाँ घोंसला उसका, अब है भारी खटका भइया
साँप को देख रही गौरइया, थर-थर काँप रही।

गैंग-रेप की मारी, जिसका एक न धीर-धरइया
अबला कैसे सहै चबइया, थर-थर काँप रही।

बन बारूद गया है जैसे सैनिक युद्ध-लड़इया
कबूतर को अब देख बिलइया थर-थर काँप रही।

नदी किनारे पंडा, सबको मूड़ रहे मुस्तंडा

नदी किनारे पंडा, सबको मूड़ रहे मुस्तंडा
धर्म से जुड़ा लूट का फंडा पूरे भारत में।

अब तो चैनल बाबा, जनश्रद्धा पर बोलें धावा
ऐंठकर दौलत बांधें गंडा पूरे भारत में।

लोकतंत्र के नायक, खादी-आजादी के गायक
थामे भ्रष्टतंत्र का झंडा पूरे भारत में।

घनी रात अँधियारी, खोयी प्यारी सुई हमारी
उसको टूँढें हम बिन हंडा पूरे भारत में।

मोहनभोग खलों को, सारे सुख-संयोग खलों को
सज्जन को सत्ता के डंडा पूरे भारत में।

सोफे ऊपर बैठी, विदेशी दे आदेश कनैटी
देशी नीति पाथती कंडा पूरे भारत में।

हम सबने फल त्यागे, लस्सी देख दूर हम भागे
प्यारे कोकाकोला-अंडा पूरे भारत में।

आबदार अपमानित, जिसने किया सदा यश अर्जित
अब तो सम्मानित हैं बंडा पूरे भारत में।

 

बदले सोच हमारे, हम हैं कामक्रिया के मारे

बदले सोच हमारे, हम हैं कामक्रिया के मारे
अबला जिधर चले इक छिनरा पीछे-पीछे है।

दालें भरें उछालें, कैसे घर का बजट सम्हालें
मूँग-मसूड़-उड़द के मटरा पीछे-पीछे है।

देखा दाना बिखरा, चुगने बैठ गयी मन हरषा
चिडि़या जान न पायी पिंजरा पीछे-पीछे है।

मननी ईद किसी की, कल चमकेगी धार छुरी की
कसाई आगे-आगे बकरा पीछे-पीछे है।

साधु नोचता तन को, कलंकित करे नारि-जीवन को
अंकित करता ‘रेप’ कैमरा पीछे-पीछे है।

आज जागते-सोते, हम अन्जाने डर में होते
लगता जैसे कोई खतरा पीछे-पीछे है।

त्यागी वे चौपालें, मन की व्यथा जहाँ बतिया लें

त्यागी वे चौपालें, मन की व्यथा जहाँ बतिया लें
अब तो चिलम-‘बार के हुक्का’ हमको प्यारे हैं।

नूर टपकता हरदम, उन बातों से दूर हुए हम
लुच्चे लपका लम्पट फुक्का हमको प्यारे हैं।

हर विनम्रता तोड़ी, हमने रीति अहिंसक छोड़ी
गोली चाकू घूँसा मुक्का हमको प्यारे हैं।

कोकक्रिया के अंधे, हमने काम किये अति गन्दे
गली-गली के छिनरे-लुक्का हमको प्यारे हैं।

धर्म-जाति के नारे, यारो अब आदर्श हमारे
सियासी धन-दौलत के भुक्का हमको प्यारे हैं ।

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