तेरी बातें ही सुनाने आए (रुबाइयाँ)-तेरी बातें ही सुनाने आए (रुबाइयाँ)(डोगरी कविता)-पद्मा सचदेव-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Padma Sachdev(अनुवादिका: पद्मा सचदेव) 

तेरी बातें ही सुनाने आए (रुबाइयाँ)-तेरी बातें ही सुनाने आए (रुबाइयाँ)(डोगरी कविता)-पद्मा सचदेव-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Padma Sachdev(अनुवादिका: पद्मा सचदेव)

आये हैं पहाड़ जान आ गयी
देह में सुख मीठा-मीठा भर गयी
थक गयी है ज़िंदगी देते हिसाब
बीजों की तरह थे बिखरे घर कई

आज न आयी तो कल रखो उम्मीद
गुंजलक से भरी पगडंडी अजीब
देखा-देखी तो बलम हो जाने दो
तेरे हाथों में नहीं मेरा नसीब

उबली, खौलकर ये बाहर आयी है
कविता है उधार की न जाई है
पानियों के नीचे से भी कई हाथ
डूब कर होती ये पार आयी है

एक धारा दो जगह बहना पड़ा
एक दूजे को भी यूं उगना पड़ा
सासरे में मैके की चिन्ता रही
यहां सोई तो वहां जगना पड़ा

चाव से देखा कि चढ़ आया है दिन
धीरे-धीरे मुट्ठी से गिर आये खिन
धूप मुंह पर फिर मली तो यूं लगा
कम किया चढ़ता हुआ मृत्यु का ऋण

चित्त में यादें तेरी, मेरा स्वभाव
गूंगा कुछ तो मांगता है पर है क्या
यादों के आंगन में बेवजह बहसें
बातों के वो तथ्य क्या पाये भला

चुपचाप खड़ा है लम्बा खजूर
ख़्वाब में कोई परी या कोई हूर
तोड़ता है कौन पक्के फल वहां
जाग रहे हो या सोये हो हज़ूर

ज़िंदगी दुखती हुई एक रग़ मुई
आह भर कर बैठी हुई चीड़-सी
ये कभी भी उबलता चिनाब-सा
आज बहती मोरी से धारा कोई

ज़िंदगी में झूठ हैं सच हैं कई
तुझसे बढ़कर कई सच है ही नहीं
इससे-उससे सबसे ही ऊपर है तू
सोच कर देखा तो तू कुछ भी नहीं

ज़िंदगी ये समय गुज़र जाए बस
एक बार पार ही हो जाऊं बस
फिर कभी आना ही पड़े तो सजन
फांस कोई गले में न डालूं बस

झांकता पहाड़ियों से कौन है
मानो बुलाता मुझे एक मौन है
राहों के बल हो गयीं पगडंडियां
मेरी मति मार गया कौन है

तड़प कर रह गयी हूं इस जाल में
टहनी उग कर फंस गयी जंजाल में
वृक्ष का कन्धा या मां की कोख थी
अटक कर भटकी हूं मायाजाल में

तान कर जो पांव लेटा सो गया
धरती पर एक दाग़ जैसा हो गया
रहगुज़र ही रहगुज़र है समझ कर
सर झुका कर रहगुज़र ही हो गया

फट गया अम्बर तो सीने लगी हूं
उधड़ा था रिश्ता जो जीने लगी हूं
चांदनी आंगन के बिछती जा रही
चाक अंधेरों के सीने लगी हूं

बरसती बारिश ये ख़बर लाई है
झोंपड़ी एक मेह में ढह आयी है
रह गयी मलबे में दबी सांस एक
उड़ती-उड़ती हवा भी कह आयी है

मेरे आंगन चांद रहता खेलता
मां की रसोई में रोटी बेलता
आसमां पर बैठ चिढ़ाता मुझे
मैं तुझे क्या जानूं मुन्ना-सा मेरा

याद तेरी बारिशों की रात है,
पूरी रात में हुई इक बात है
टुकड़े-टुकड़े कर लो रात के सखि।
देखो कितनी लंबी यह कमजात है।

सांस ली वृक्षों ने पत्ते कांप गये
वादे जितने भी थे सारे मिट गये
पक्षियों ने हाथ सिकोड़े हैं जब
टहनियों के अंग सब घायल हुए

सांसों की कोसी सी गरमी छू गयी
कोंपलों पर हिलती पहछाई रही
चारों दिशाओं का भीगा है माहौल
हवा इधर उधर कुरलाती फिरी

हिल रहे पत्ते सभी यहां-तहां
लोग कुछ छुपे हुए शायद वहां
आसरा जिनका है डर उनका ही है
वो न शर्मिंदा करें कहां-कहां

Leave a Reply