तेरा हार-हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

तेरा हार-हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

 

तुमसे

(१)
नहीं चाहता तुलसी दल बन
शीश तुम्हारे चढ़ पाऊं,
नहीं, हार की कलियां बन कर
गले तुम्हारे पड़ जाऊं ।

( २ )
नहीं भुजायों में रख तुमको
इन हाथों को करूं पवित्र,
नहीं, हृदय के अन्दर वन्दी
कर के रखूं चित्र ।

( ३ )
नहीं चाहता दिखलाने को
तव भक्तों का वेश धरूं,
नहीं, सखा बन सदा तुम्हारे
दाएँ बाएँ फिरा करूं ।

( ४ )
इच्छा केवल रजकण में मिल
तव मन्दिर के निकट पड़ूं,
आते जाते कभी तुम्हारे
श्री-चरणों से लिपट पड़ूं ।

मधुर स्मृति

(१)
याद मुझे है वह दिन पहले
जिस दिन तुझको प्यार किया,
तेरा स्वागत करने को जब
खोल हृदय का द्वार दिया ।

( २ )
मन मन्दिर में तुझे बिठा कर
तेरा जब सत्कार किया,
झुक झुक तेरे चरणों का जब
चुम्बन बारम्बार किया ।

( ३ )
स्नेहमयी वह दृष्टि प्रथम ही
थी जिसने तुझको देखा,
याद नहीं है मुझे, तुझे
देखा पहले या प्यार किया !

( ४ )
हर्षित हो कर क्यों न सराहूं
बार बार उस दिन के भाग,
जिस दिन तूने प्रेम हमारा
खुले हृदय स्वीकार किया !

 दुखिया का प्यार

(१)
“प्रेम का यह अनुपम व्यवहार !
पास न मेरे हैं वे आते,
मुझे न अपने पास बुलाते,
दूर दूर से कहते हैं, करता हूँ तुझको प्यार !!”

( २ )
“आपदा के ऐसे आगार–
जहाँ किसी को छू हम देते,
घेर उसे दुख संकट लेते !
मिल कर तुझसे क्यों तुझ पर भी डालूं दुख का भार ?

( ३ )
विरह के दुख सौ नहीं, हजार
सहा करूं यदि जीवन भर मैं,
तुझे न दुखित बनाऊँ पर मैं,
‘तू है सुखी’-यही तो मेरे जीवन का आधार ।

( ४ )
प्रेम का ही तोड़ूंगा तार-
( चाहे मृत्यु भले ही आए )
ज्ञात मुझे यदि यह हो जाए-
दुखी बना सकता है तुझको इस दुखिया का प्यार “।

कलियों से

1
अहे ! मैंने कलियों के साथ,
जब मेरा चंचल बचपन था,
महा निर्दयी मेरा मन था,
अत्याचार अनेक किए थे,
कलियों को दुख दीर्घ दिए थे,
तोड़ इन्हें बागों से लाता,
छेद-छेद कर हार बनाता !
क्रूर कार्य यह कैसे करता,
सोंच इन्हें हूँ आहें भरता।
कलियो ! तुमसे क्षमा माँगते ये अपराधी हाथ।

2
अहे ! वह मेरे प्रति उपकार !
कुछ दिन में कुम्हला ही जाती,
गिरकर भूमि समाधि बनाती।
कौन जानता मेरा खिलना ?
कौन, नाज़ से डुलना-हिलना ?
कौन गोद में मुझको लेता ?
कौन प्रेम का परिचय देता ?
मुझे तोड़ की बड़ी भलाई,
काम किसी के तो कुछ आई,
बनी रही दे-चार घड़ी तो किसी गले का हार।

3
अहे ! वह क्षणिक प्रेम का जोश !
सरस-सुगंधित थी तू जब तक,
बनी स्नेह-भाजन थी तब तक।
जहाँ तनिक-सी तू मुरझाई,
फेंक दी गई, दूर हटाई।
इसी प्रेम से क्या तेरा हो जाता है परितोष ?

4
बदलता पल-पल पर संसार
हृदय विश्व के साथ बदलता,
प्रेम कहाँ फिर लहे अटलता ?
इससे केवल यही सोचकर,
लेती हूँ सन्तोष हृदय भर—
मुझको भी था किया किसी ने कभी हृदय से प्यार !

 विरह विषाद

( १ )
चंद्र ! आते हो मृदुल प्रभात-
भू का रवि जब अञ्चल धरता,
किरण, कुसुम, कलरव से भरता
उसे, बना लेते क्यों अपना मलिन, हीन द्युति गात ?

( २ )
निशा रानी का विरह विषाद ?
शोक प्रकट क्यों इतना करते ?
छिपते जाते आहें भरते ।
मिलन प्रणयिनी से तो निश्चित एक दिवस के बाद !

( ३ )
नहीं कुछ सुनते मेरी बात ?
देव ! दुख विरह क्षणिक तुम्हें जब,
इतना होता, बतलायो अब,
धरें धैर्य्य मानव हम क्यों तब,
हो वियोग जिनका मिलना फिर दूर ? निकट ? अज्ञात !

मूक प्रेम

( १ )
हमारी स्नेह मूर्ति ! कुछ बोल ।
भावना के पुष्पों के हार,
गूंथ सुकुमार स्नेह के तार,
चढ़ाए मैंने तेरे द्वार,
भाए तुझे, न भाए-कह दे कुछ तो मुँह को खोल ।

( २ )
शास्त्र के सिद्ध, सत्य, अनमोल
वचन बतलाते युग प्राचीन
भक्त जब होता भक्ति विलीन,
श्रवण कर उसके सविनय, दीन
वचन, मूक पाषाण मूर्तियां भी पड़ती थीं बोल !

( ३ )
आ गया हाय ! समय अब कौन ?
हैं सजीव जो मधुर बोलतीं,
बात बात में अमृत घोलतीं,
सहज हृदय के भाव खोलतीं,
वे भी क्या भावना भक्ति से हो जायेंगी मौन !

( ४ )
नयन में स्नेह भरा, मत मोड़
आँख, कर प्रकटित अपना भाव,
भयकर मुझसे अधिक दुराव ।
जानती अकथित प्रेम प्रभाव ?
प्रबल धार यह बाहर आती बाँध हृदय का तोड़ !

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