तेरहवीं का विहान-कविता-दीपक शर्मा-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Sharma

तेरहवीं का विहान-कविता-दीपक शर्मा-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Sharma

 

कल मेरे पड़ोसी
गंगू चाचा के पिताजी की तेरहवीं थी
ब्रह्मभोज में भीड़ खूब जुटी थी
पहले ब्रह्मणों ने भोग लगाया
दक्षिणा ग्रहण किया
फिर देर तक चलता रहा भोज
गाँव के खड़ंजे पर
साइकिल, मोटर साइकिल, पैदल
कार, स्कार्पियो के आने जाने से चहल-पहल थी
खद्दरधारी, काले कोट, सायरन
व नीली बत्ती वालों के लिए
वीआईपी व्यवस्था थी
अंत में
उत्तीर्ण कहने के बाद
सबने कहा – मृतक आत्मा को शांति मिली

सुबह घर के पिछवाड़े
जुठे पत्तलें
चाटते हुए कुत्ते दिखें
विखरे अन्न को
टोड़ से उठाते पंछी
और खिड़की के पीछे
शराब की अनेक खाली बोतलें
हलवाई नशे में अब तक बुत्त पड़ा है
रग्घू काका का पैंट पेशाब से
खराब हो गया था
यह बात उन्हें सुबह मालूम हुई

गाँव के दक्षिणी टोला में
मुसहरों की बस्ती थी
हाथ में लोटा, थाली, भगोना लेकर
औरतें और बच्चे
द्वार पर आ चुके थे
जिन्हें कल के भोज में
निमंत्रण नहीं था
उनमें कुछ डेरा डालकर
रहने वाले वासिंदे थे
वे झारखण्ड या छत्तीसगढ़ से
पलायन आदिवासी हैं
दाल में खटास आ गया था
पर वे लेने से मना नहीं कर रहे थे
सब्जी में गिरे कॉकरोच को
सावधानी से निकालकर
बाहर फेक दिया गया था
पुड़ियाँ कठोस हो गयी थी
चावल लिजलिजाने लगा था
किंतु उन्हें लेने में हिचक न थी
वरन् अत्यधिक प्रसन्नता थी
बुनिया के डेग को ढककर
ओसारे में खिसका दिया गया था
जो कि मुसहरों के हिस्से में न था

उत्तरी टोला के लिए
जो भोजन
बेकार और बेस्वाद हो चुका था
दक्षिणी टोला के लिए वही भोजन
विशेषाहार था
आज उन्हें रोटी के लिए
सोचना नहीं पड़ेगा
गेहूँ के खलिहान में
मुसकइल में हाथ डालना नहीं पड़ेगा
पेड़ पर बैठी पंछी पर
गुलेल से निशाना लगाना नहीं पड़ेगा
बच्चों को आगे करके
किसी के आगे
हाथ फैलाकर गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा
आज जो मजदूरी कर लेंगे वे
उनकी एक दिन की बचत होगी।

 

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