तुम और मैं-लहर पुकारे -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

तुम और मैं-लहर पुकारे -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

तुम जीवन की सुनसान डगर
मैं कपित शंकित चरण,
चरण तुम तरुण अरुण भी करुण
और मैं दबी शर्म-सी शरण ।

मधुर मैं टूटा शिशु का स्वप्न,
थपकतीं तुम कर की ममता,
दान-सी तुम महानता मौन,
भिक्षु-झोली की मैं लघुता ?

प्रथम तुम वर्षा ऋतु की बूँद,
विधुर-उर की मैं उठती पीर,
तृषित मैं मधु का मधुपी बाल
और तुम चंचल सुरसरि-नीर ।
प्रथम तुम सजल उषा की किरन
और मैं अन्तिम नभ-तारा,
प्रथम तुम दो नयनों की बात
और मैं मन जीता हारा ।

युगों की तुम अनंत अथ बाट,
बाट तकती थकती मैं आस
गंध तुम मधु-मकरन्द अमन्द
मधुम-मन की मैं मीठी प्यास ।
उदधि तुम अगम, अपार, असीम,
और मैं बुदबुद का अस्तित्व,
देश स्वातंत्रय अंक तुम अमर,
मचलते शिशु का मैं शुभ स्वत्व,

प्रबल तुम झननन न झंझा अनिल
और मैं प्राण-दीप-कंपन,
घुमड़ते घन तुम भीमाकार
जीर्ण झोंपड़ियों का मैं रुदन ।

गिर रही गिरि से मैं सरि-धार,
अंक भरते तुम प्रिय भुज-कूल,
चपल अंचल बन मैं उड़ रहा,
थामते तुम पाटल-दल-शूल ।

मधुर तुम खोयी मंज़िल मिली,
यक्रित मन का मैं अर्जित यत्न,
उग रहे तुम जल में राकेन्दु,
और मैं बाल-चकोर-प्रयत्न ।

सुहागिन कामिनि की मैं माँग,
और तुम कुंकुम रक्तिम रेख,
प्रतनु तुम तिय-अवगुंठन गोल
झाँकती मैं चल चितवन एक ।

इकाई तुम जीवन की पूर्ण,
अपूर्ण शून्य मैं प्राण-प्रतीक,
प्रीति-रथ-गति बन तुम चल रहे
और मैं बनती-मिटती लीक ।

बुझ रहा मैं अग्निल अंगार,
पड़ीं तुम पतली उजली राख,
विफल तुम कृत्रिम कृति, आचरण
गई मैं बात, गई में साख ।

जागते बीती तुम निशि अर्ध,
और मैं निद्रित असलित आँख,
प्राण ! तुम पवन पंख बन उड़े,
मृदुल मैं झूल गई कलि पाँख ।

भयंकर वज्र-खंड तुम घोष,
और मैं काँप रहा तरु-नीड़
मंच के तुम पट पूर्ण सुखान्त
और मैं उठती दर्शक-भीड़ !

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