तुम्हे कौन समझाए-उमेश दाधीच -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umesh Dadhich

तुम्हे कौन समझाए-उमेश दाधीच -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umesh Dadhich

वो चाहत, वो हसरत तेरी
वो किस्से, वो कहानी मेरी
पन्नो में सिमट के रह गयी वो
बिलख कर मोहब्बत अधुरी
ये तुम्हे कौन समझाए ?
तुमने देखे है चहकते चेहरे
तुमने देखी बस आंखे खिली
कब तुमने अश्को से पूछा
सुखे गये जो तुम ना थी मिली ।
ये कौन तुम्हे समझाए ?
मेरी ख्वाइश,मेरी जिद्द बस
इस तक तुम सिमित रही
कैसे जिया हूं मैं तुम बिन
मरने तक तुम निमित रही ।
ये तुम्हे कौन समझाए ?
हुये सौदे,रूह की बोली लगी
बिके सरेराह खामोश होकर
रोशन थे घर नये हुक्मरानो के
भस्म हुये संग तेरे अरमानो के ।
ये तुम्हे कौन समझाये ??

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