तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

खुद आप हैं बैठे महलों में माता घुमे सड़कों पर
जो माँ का दूध लजाते हैं धिक्कार ऐसे लड़कों पर
गौ सेवा के नाम पे जो आडम्बर फैलाते हैं
खुद उनके ही आँगन से गोवंश निकाले जाते हैं
सड़कों पर वो झुण्ड बनाकर दुर्घटना के कारक हैं
कूड़ा कचरा खाकर वो खुद अपने ही संहारक हैं
आपस में ही लड़ते हैं जनता को दुख पहुँचाते हैं
कभी किसी वाहन से लड़कर अपने पाँव तुड़ाते हैं
आवाज़ लगाता हूँ उनको जो काट रहे इंसानों को
गोरक्षा का संकल्प लिए गऊ माता की संतानों को
मात्र एक गोवंश को तुम अपनाकर जरा दिखाओ तो
बस छुट्टा घूम रहा इक बछड़ा अपने घर ले जाओ तो
कर न सके जो ऐसा तो तुम मानो कि अतिवादी हो
गो हत्या के पाप के तुम भी उतने ही अपराधी हो
गोवंश खुला क्यों छोड़ते हो क्या गौमाता से प्यार नहीं
जब तक जुर्म ये करते हो तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं

Leave a Reply