तुम्हारी ओर से-त्रिकाल संध्या-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

तुम्हारी ओर से-त्रिकाल संध्या-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

तुम्हारी और से झिल्ली जो
मढ़ी गई है मेरे ऊपर
तन्तु जो तुम्हारा बाँधे है मुझे
इच्छा जो अचल है
तुमसे आच्छादित रहने की

आशा जो अविचल है मेरी
तुममें समा जाने की

कैसे उसे उतारूँ
कैसे उसे तोडूं कैसे उसे छोडूं

जोडूं कैसे अब इन सबको
अपने या पराये किसी छोर से

तुम्हारी और से जो मढ़ा गया है
नशा-सा चढ़ा गया है वह मुझ पर

ठगी सी बुद्धी को जगाऊँगा
तो कौन कह सकता है
लजाऊंगा नहीं
होश में आने पर!

 

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