तुमको केत्ता मिला है-भूल जाओ पुराने सपने -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

तुमको केत्ता मिला है-भूल जाओ पुराने सपने -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

सौ वर्ष पुरानी बुढ़िया
अपनी झोपड़ी के बाहर
सवेरे सवेरे
धूप सेंक रही थी
इधर-उधर लोग आ-जा रहे थे
मुझे उँगली के इशारे से
उसने रोका –
अस्पष्ट भाषा की
अवधी बोली थी :

‘बाबू, क्या पाँच साल बाद
फिर वही खेल
खेलने आए हो आप लोग ?
दिल्‍ली से आए हो ?
चाँदी का गोल-गोल सिक्का
बिछाकर यह खेल खेलते हैं
इस बार भी क्‍या वही राजा बनेगा ?
क्या वही दरबारी होंगे ?
सच-सच बतलाना
तुमको केत्ता रुपया मिला है ?
कुछ हमको भी दिलवाना भइया !’
बुड्ढी का बकवास सुनने के लिए
हमारे पास वक्‍त नहीं था,
हम सरपट भागे
गौरीगंज वाली सड़क की तरफ !

(जनसत्ता / 5 नवम्बर, 89)

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