तिशनगी- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

तिशनगी- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

न जाने किस शौक में
वादियों में तितलियों की तरह
दूर दूर शबिशतानों में
रंग-ओ-बू की तलाश में
भटका किया
मगर ख़ाब तो आख़िर ख़ाब हैं
सुराब तो आख़िर सुराब हैं
फूल तो नहीं-हां
अंगारों के गुलदस्तों ने
ख़ुश-आमदीद कहा मुझसे
हाथ भी दामन भी
जिस्म भी सब कुछ
नज़र-ए-आतिश हो गया
पांव के आबलों ने
दिल शिकनी तो की मगर
बफ़ूर-ए-शौक ने तिशनगी को
और भी भड़का दिया
मेरे आंगन में उगे पेड़
उसकी छांव और सिहर ने
जीने की तमन्ना को और भड़का दिया
मैं मायूस तो नहीं
दिल शिकशता भी हरगिज़ नहीं
मुझे तो जानिब-ए-मंज़िल चलना है अभी
आख़िर तो अंगारों में दफ़न होना है मुझे
वादी-ए-नार में सोना है अभी
यकीनन मेरे हिस्से की ज़मीं से
एक दिन
फूटेंगे गुलाबों के चमन
और मैं ख़ुशबू बन हर तरफ़
‘बेताब’ फैल जाऊंगा
हर किसी को
मुहब्बत का नग़मा सुनाऊंगा

Leave a Reply