तिचरु वसहि सुहेलड़ी-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

तिचरु वसहि सुहेलड़ी-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥
जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥१॥
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥
धंनु सु तेरा थानु ॥१॥ रहाउ ॥
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥
जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥२॥
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥
गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥३॥
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥
नानक धंनु सोहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥4॥23॥93॥50॥

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