तालिबानी फ़रमान-कविता-मोहनजीत कुकरेजा -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mohanjeet Kukreja

तालिबानी फ़रमान-कविता-मोहनजीत कुकरेजा -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mohanjeet Kukreja

 

तुम्हारा
यह तालिबानी फ़रमान
कि मैं
नज़्म तो कहूँ
पर
होंटों पर अपने
शब्द चिपका कर
ख़ामोश घूमता रहूँ
अर्थों की निरथर्क गलियों में
‐ तुम्हारा यह तालिबानी फ़रमान
तुम्हारा यह तुग़लकी फ़रमान ।

नज़्म कही तो जाए
लिखी न जाए ।
लिखी जाए पर
पढ़ी न जाए ।
और पढ़ी जाए
तो सिर्फ़ मूक रह कर
‐ तुम्हारा यह तालिबानी फ़रमान
तुम्हारा यह तुग़लकी फ़रमान ।

कोई
क्या खाये
क्या पहने
क्या लिखे
क्या गाये
‐ तुम्हारा यह तालिबानी फ़रमान
तुम्हारा यह तुग़लकी फ़रमान ।

शब्द हूँ ‐ सोच हूँ
वाक्य हूँ एक
मैं
बीज बन के पनप जाऊँगा
बंद‐प्रतिबंद की मिट्टी से
‐ इक रोष-वृक्ष बन उग आऊँगा ।

मैं हाज़िर हूँ
मेरे दोस्तो
अपने माथे पर
जलते‐सुलगते शब्द सजा कर,

किसी मुकुट जैसे…
किसी ताज की तरह
एक समूची‐सालम
नज़्म बन कर ।

(मूल रचना: डा. रमेश कुमार;
हिंदी अनुवाद: मोहनजीत कुकरेजा)

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