तारीफ़ भैरों की- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

तारीफ़ भैरों की- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

देखा है जब से मैंने, तेरा जमाल भैरों।
रखता हूं तब से दिल में, तेरा ख़याल भैरों।
दिन रात है यह मेरा, तुझसे सवाल भैरों।
अब दर्दो ग़म से आकर मुझको संभाल भैरों।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥1॥

आंखों में छा रहा है, तेरा सरूप काला।
तन में भभूत गहरी, गल बीच मुंड माला।
आंखें दिया सी रोशन, हाथों में मै का प्याला।
हूं दिल से दास तेरा, सुन ऐ मेरे दयाला।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥2॥

क्या-क्या मची हैं तेरे, दरबार की बहारें।
भगती कला पे तेरी, जी जान अपना वारें।
सब अपना अपना कारज, मन मानता संवारें।
सेवक चरन को चूमें, इष्टी खड़े पुकारें।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥3॥

माथे पे तेरे टीका, सिंदूर का बिराजे।
मद पीवे मास खावे, जो तू करे सो छाजे।
तिरसूल कांधे ऊपर, डमरू की गत भी बाजे।
सब तज के मैंने अब तो, तेरी दया के काजे।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥4॥

तू राक्षसों के तन से, हर आन सर उखाड़े।
चाहे जिसे, बसावे चाहे जिसे उजाड़े।
जो तुझ से दू बदू हो, एक आन में लताड़े।
दानों को चीर डाले दैयत को भी पछाड़े।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥5॥

गुस्से में तू जो आकर अपनी जटा हिलावे।
धरती, अकास, पर्वत, पाताल दहल जावे।
सर काट राक्षसों के, झोंटे पकड़ हिलावे।
झांके कलाल ख़ाना, कुत्तों को खूं चटावे।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥6॥

जोगी अतीत जंगम तेरे चरन से लागें।
सेवें जो तुझको उनके सोते नसीब जागें।
जब नाम लेके तेरा, भड़कावें तप की आगें।
जिन, देव हाथ जोड़े, भूत और पलीत भागें।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥7॥

है कौन अब जो निकले, तुझ मस्त से अकड़ कर।
दुष्टों को लात मुक्के, मूज़ी के सर को टक्कर।
किरपा है तेरी मेरे हक़ में तो क़न्दो शक्कर।
अब सब तरह से मैंने तेरी दया को तक कर।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥8॥

मेरा तो कोई इस जा, अपना है ना बिगाना।
बेकस हूँ, बे हुनर हूँख् और है बुरा ज़माना।
ऐ बेकसों के वाली, मेरी मदद को आना।
तेरे सिवा किसी जा, मेरा नहीं ठिकाना।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥9॥

पूजा कथा में तेरी, मैं गुन बखानता हूं।
तुझको ही पूजता हूं, तुझको ही मानता हूं।
धूल अब तेरे चरन की, माथे पे सानता हूं।
तेरा ही हो रहा हूं, तुझको ही जानता हूं।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥10॥

तू शाह मैं भिखारी, मैं क्या कहूं कि क्या दे।
जो दिल में तेरे आवे, दाता मुझे दिला दे।
मुझसे बिगड़ चले को, अब मेहर कर बना दे।
अब जिस तरह से चाहे, चिन्ता मेरी मिटा दे।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥11॥

अब ग़म मेरे जिगर को, तीरों से छानता है।
और गर्द बेकसी की, नित सर पे छानता है।
किस से कहूं मैं जाकर, कौन, आह मानता है।
जो दुख है मेरे जी पर, सो तू ही जानता है।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥12॥

जो दुख है मेरे जी पर अब किसको जा सुनाऊं।
किससे पनाह मांगू, यह दुख किसे दिखाऊं।
अब बेकसी मैं अपनी, जाकर किसे सुनाऊं।
तेरा कहाके अब मैं, किसका भला कहाऊं।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥13॥

अब किस तरह जताऊं, मैं अपनी बेकली को।
ने सुख है मेरे दिल को, न चैन मेरे जी को।
पूछे जो मेरे दुख को, अब क्या पड़ी किसी को।
मुझसे भले बुरे की, अब लाज है तुझी को।
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥14॥

है जिनको अब जहां में तुझ इष्ट का सहारा।
दिन रात बाजता हैउनका सदा नक़ारा॥
है ‘बेनजीर’ तेरी किरपा का ठाठ सारा।
मानक जती गहे हैं भैरों सरन तिहारा॥
तेरी सरन गही है, कर तू निहाल भैरों॥
ऐ पर्तपाल देवत, मद मस्त काल भैरों॥15॥

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