तारीफ़ पंजतन पाक- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

तारीफ़ पंजतन पाक- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

है दिल में मेरे याद जो बारह इमाम की।
और आरजू है साक़िये कौसर के जाम की।
यह बैत मुझको विर्द है हर सुबहो शाम की।
तस्बीह हजार दाना है और उनके नाम की।
सुमरन मुझे भली है यह पंजतन के नाम की॥1॥

अव्वल तो दिल हो साफ़ दोयम जिस्म ताबनाक।
सोयम कहाऊं दोनों जहां में गुनाह से पाक।
चौथे अदद का गै़ब से हो जावे सीना चाक।
और पांचवीं मैं डालूं मुख़ालिफ़ के सर पे ख़ाक।
सुमरन मुझे भली है यह पंजतन के नाम की॥2॥

तन है सौ पाक साफ़ मुअत्तर हो मिस्ल फूल।
हो रूह शाद दिल न हो मेरा कभी मलूल।
दोनों जहाँ में ख़ुश रहूं अज़ खि़दमते रसूल।
रोजा, नमाज़, विर्दो वज़ाइफ़ हो सब क़ुबूल।
सुमरन मुझे भली है यह पंजतन के नाम की॥3॥

भागे चुड़ैल कांप उठे भूत और पलीद।
टल जावें देव छुपने लगें मुन्किरे शदीद।
जिन्नों परी हों दिल से मेरे आन कर मुरीद।
जीता रहूं तो शाह, जो मर जाऊँ तो शहीद।
सुमरन मुझे भली है यह पंजतन के नाम की॥4॥

नारा करूं जो हैदरी हिल जावें सब पहाड़।
थर्रावें चश्मए सार हिलें डर से बूटे झाड़।
गर ख़ारिजी हो आवे मेरे आगे मिस्ल ताड़।
पगड़ी को इसकी फेंक के दाढ़ी को लूँ उखाड़॥
सुमरन मुझे भली है यह पंजतन के नाम की॥5॥

ऐ दोस्तो अजब है बना पंजतन का नाम।
जिसके तुफ़ैल इतने बर आते हैं सब के काम।
जो हैं सो हैं यही ख़तमुलखै़र वस्सलाम।
और मैं जो हूं “नज़ीर” तो कहता हूं सुबहो शाम।
सुमरन मुझे भली है यह पंजतन के नाम की॥6॥

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