ताटंक -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

ताटंक -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

तम-पूरित इस अमा-निशा में कौन लोक से आई तू;
आलोकित कर अवनी-तल को कौन सँदेशा लाई तू।
दीपावलि को लिये करों में पहने कुसुमावलि-माला;
किसे खोजती है बन आकुल, पीकर किस रस का प्याला?
विलसित गगन-तारकावलि में जिसकी कला दिखाती है;
क्या तू उसके लिए आरती अति ही ललित सजाती है?
या रंजिनी रमा-रंजन-हित यह आयोजन है सारा;
या जागती ज्योति की तुझमें है जगमगा रही धारा।
या तू है बिधु-रुचिर-सहचरी, विरहानल में जलती है;
विपुल थलों में विविध रूप धार जी की जलन निकलती है।
या तू शरद-विदित सितता है, यथासमय दिखलाई है;
राका-निशि की बची असितता को सित करने आई है।
या तू भारत के भवनों के, कोनों को आलोकित कर;
खोज रही है उस वैभव को, जो था विश्व-विमोहित कर।
अथवा खोल अमित नयनों का तू है यह अवलोक रही;
क्या है वह गौरव भारत का, क्या है भारत-भूमि वही।
तू है नगर-नगर पुर-पुर में, ग्राम-ग्राम में घूम रही।
चाहक चाह-भरे लोचन को चाव-सहित है चूम रही।
दीप मालिके! दीपावलि से क्या तू ज्योति जगावेगी;
क्या भव सफल-भूत-भावों से भारत-तिमिर भगावेगी।

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