तसवीर बन गया-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

तसवीर बन गया-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

जिसने देखा तुम्हें तुम्हारी ही फिर वह तसवीर बन गया ।

जनम-जनम से तुम्हें खोजता था मैं ओ मेरे अभिमानी!
आज तुम्हें जाना तो मुझको मेरी शक्ल लगी अनजानी
पर इससे भी बढ़कर अचरज हुआ कि जब पूजन-वेला में
भक्ति तुम्हारी मूर्ति बन गई, मन्दिर मर्त्य शरीर बन गया !

जिसने देखा तुम्हें तुम्हारी ही फिर वह तसवीर बन गया ।

तुम्हें छू लिया था सूरज ने वह देखो अब तक जलता है,
झाँकी भर देखी थी शशि ने वह अब तक आँसू ढलता है,
बादल को था गर्व बहुत वह धो ही लेगा चरण तुम्हारे
हाथ बढ़ाते ही पर उसका सारा जीवन नीर बन गया ।

जिसने देखा तुम्हें तुम्हारी ही फिर वह तसवीर बन गया ।

तुम्हें चूमने गया शलभ तो करना पड़ा भस्म उसको तन
रूप देख आया सो खुद हो गया अरूप रूप का दर्पण
की ही थी आरती अग्नि ने बुझना पड़ा धूम्र बन उसको
तुम्हें खोजते घर-घर खुद ही बे घरबार समीर बन गया ।

जिसने देखा तुम्हें तुम्हारी ही फिर वह तसवीर बन गया ।

तुमने किसे बुलाया जो मरघट से लौट पड़ा जग सारा
कौन तिराई तरी कि खुद ही मिलने को चल पड़ा किनारा
क्रीड़ा की वह कौन सृष्टि के आँगन में उस दिन जो छिन में
पद-रज झर कर धरा बन गर्व, अम्बर उड़कर चीर बन गया ।

जिसने देखा तुम्हें तुम्हारी ही फिर वह तसवीर बन गया ।

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