तवक्कुलो तर्को तजरीद-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

तवक्कुलो तर्को तजरीद-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

जितने तू देखता है यह फल, फूल पात, बेल।
सब अपने अपने काम, की हैं कर रहे झमेल।
नाता है यां सो नाथ, जो रिश्ता है सो नकेल।
जो ग़म पड़े सो इसको तू अपने ही तन पे झेल।
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥1॥

यह सूरतें जो देखे हैं मत इनसे दिल लगा।
बर्रें यह सोतियां हैं इन्हें ऐ यार मत जगा।
शिजरा कुलाह फेंक उड़ादे झगा तगा।
आगे को छोड़ नाथ, न पीछे को रख पगा।
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥2॥

जब तू हुआ फ़क़ीर, तो नाता किसी से क्या।
छोड़ा कुटम, तो फिर रहा रिश्ता किसी से क्या।
मतलब भला फ़क़ीर को, बाबा किसी से क्या।
दिलबर को अपने छोड़ के, मिलना किसी से क्या।
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥3॥

तेरी न यह ज़मीं है न तेरा यह आस्मां।
तेरा न घर, न बार, न तेरा यह जिस्मोजां॥
उसके सिवा कि जिस पे हुआ तू फ़क़ीर यां।
कोई तेरा रफ़ीक़, न साथी, न मेहेरबां॥
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥4॥

देता है दिल को अपने तो दे उस किसी के हात।
जिस यार से कि हो तेरे जीते मुए का सात॥
और यह जो तुझसे करते हैं मिल मिल के मीठी बात।
मारा पड़ेगा देख, न खा उनके हात घात॥
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥5॥

यह उल्फतें कि साथ तेरे आठ पहर हैं।
यह उल्फतें नहीं हैं मेरी जान क़हर हैं॥
जितने यह शहर देखे हैं, जादू के शहर हैं।
जितनी मिठाइयां हैं, मेरी जान ज़हर हैं॥
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥6॥

खूबां के यह जो चांद से मुंह पर खुले हैं बाल।
मारा है तेरे वास्ते, सैयाद ने यह जाल॥
यह बाल, बाल अब है तेरी जान का बबाल।
फंसियो खुदा के वास्ते इसमें न देखभाल॥
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥7॥

जिसका तू है फ़क़ीर, उसी को समझ तू यार।
मांगे तो मांग उस से ही क्या नक़्द, क्या उधार॥
देवे तो ले वही, जो न देवे तो दम न मार।
उसके सिवा किसी से न रख अपना कारोबार॥
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥8॥

दुनियां इसे न जान, यह दरिया है कहरदार।
लाखों में इससे कोई उतर कर हुआ न पार॥
जब तू बहा तो फिर, न मिलेगा तुझे किनार।
मल्लाह यां, न नाव, न बल्ली है मेरे यार?
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥9॥

दुनियां न कह इसे, यह तिलिस्मात हैं मियां।
यह जानवर, यह बाग़, यह गुलज़ार यह मकां॥
शक्लें जो देखता है यह जादू की हैं अयां।
सब कुछ तेरे तई है, यह धोके की टट्टियां॥
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥10॥

क्या फ़ायदा? अगर तू हुआ नाम का फ़क़ीर।
होकर फ़क़ीर, तो भी रहा जाल में असीर॥
ऐसा ही था तो फ़क्र को नाहक़ किया हक़ीर।
हम तो इसी सखुन के हैं क़ायल मियां ‘नज़ीर’॥
गर है फ़क़ीर तू, तो न रख यां किसी से मेल।
यां तूंबड़ी, न बेल, पड़ा अपने सर पे खेल॥11॥

Leave a Reply