तल्खियाँ -साहिर लुधियानवी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sahir Ludhianvi Part 2

तल्खियाँ -साहिर लुधियानवी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sahir Ludhianvi Part 2

इसी दोराहे पर

अब न इन ऊंचे मकानों में क़दम रक्खूंगा
मैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थी
अपनी नादार मोहब्बत की शिकस्तों के तुफ़ैल
ज़िन्दगी पहले भी शरमाई थी, झुंझलाई थी

और ये अहद किया था कि ब-ई-हाले-तबाह
अब कभी प्यार भरे गीत नहीं गाऊंगा
किसी चिलमन ने पुकारा भी तो बढ़ जाऊँगा
कोई दरवाज़ा खुला भी तो पलट आऊंगा

फिर तिरे कांपते होंटों की फ़ुन्सूकार हंसी
जाल बुनने लगी, बुनती रही, बुनती ही रही
मैं खिंचा तुझसे, मगर तू मिरी राहों के लिए
फूल चुनती रही, चुनती रही, चुनती ही रही

बर्फ़ बरसाई मिरे ज़ेहनो-तसव्वुर ने मगर
दिल में इक शोला-ए-बेनाम-सा लहरा ही गया
तेरी चुपचाप निगाहों को सुलगते पाकर
मेरी बेज़ार तबीयत को भी प्यार आ ही गया

अपनी बदली हुई नज़रों के तकाज़े न छुपा
मैं इस अंदाज़ का मफ़हूम समझ सकता हूँ
तेरे ज़रकार दरीचों को बुलंदी की क़सम
अपने इकदाम का मकसूम समझ सकता हूँ

अब न इन ऊँचे मकानों में क़दम रक्खूंगा
मैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थी
इसी सर्माया-ओ-इफ़लास के दोराहे पर
ज़िन्दगी पहले भी शरमाई थी, झुंझलाई थी

 एक तस्वीरे-रंग

मैं ने जिस वक़्त तुझे पहले-पहल देखा था
तू जवानी का कोई ख़्वाब नज़र आई थी
हुस्न का नग़्म-ए-जावेद हुई थी मालूम
इश्क़ का जज़्बा-ए-बेताब नज़र आई थी

ऐ तरब-ज़ार जवानी की परेशाँ तितली
तू भी इक बू-ए-गिरफ़्तार है मालूम न था
तेरे जल्वों में बहारें नज़र आती थीं मुझे
तू सितम-ख़ुर्दा-ए-इदबार है मालूम न था

तेरे नाज़ुक से परों पर ये ज़र-ओ-सीम का बोझ
तेरी परवाज़ को आज़ाद न होने देगा
तू ने राहत की तमन्ना में जो ग़म पाला है
वो तिरी रूह को आबाद न होने देगा

तू ने सरमाए की छाँव में पनपने के लिए
अपने दिल अपनी मोहब्बत का लहू बेचा है
दिन की तज़ईन-ए-फ़सुर्दा का असासा ले कर
शोख़ रातों की मसर्रत का लहू बेचा है

ज़ख़्म-ख़ुर्दा हैं तख़य्युल की उड़ानें तेरी
तेरे गीतों में तिरी रूह के ग़म पलते हैं
सुर्मगीं आँखों में यूँ हसरतें लौ देती हैं
जैसे वीरान मज़ारों पे दिए जुलते हैं

इस से क्या फ़ाएदा रंगीन लिबादों के तले
रूह जलती रहे घुलती रहे पज़मुर्दा रहे
होंट हँसते हों दिखावे के तबस्सुम के लिए
दिल ग़म-ए-ज़ीस्त से बोझल रहे आज़ुर्दा रहे

दिल की तस्कीं भी है आसाइश-ए-हस्ती की दलील
ज़िंदगी सिर्फ़ ज़र-ओ-सीम का पैमाना नहीं
ज़ीस्त एहसास भी है शौक़ भी है दर्द भी है
सिर्फ़ अन्फ़ास की तरतीब का अफ़्साना नहीं

उम्र भर रेंगते रहने से कहीं बेहतर है
एक लम्हा जो तिरी रूह में वुसअत भर दे
एक लम्हा जो तिरे गीत को शोख़ी दे दे
एक लम्हा जो तिरी लय में मसर्रत भर दे

एहसासे-कामरां

उफके-रूस से फूटी है नई सुब्ह की जौ
शब का तारीक जिगर चाक हुआ जाता है
तीरगी जितना संभलने के लिए रुकती है
सुर्ख सैल और भी बेबाक हुआ जाता है

सामराज अपने वसीलों पे भरोसा न करे
कुहना जंजीरों की झनकार नहीं रह सकती
जज्बए-नफरते-जम्हूर की बढ़ती रौ में
मुल्क और कौम की दीवार नहीं रह सकती

संगो-आहन की चटानें हैं अवामी जज्बे
मौत के रेंगते सायों से कहो कट जाएं
करवटें ले के मचलने को है सैले-अनवार
तीरा-ओ-तार घटाओं से कहो छंट जाएं

सालहा-साल के बेचैन शरारों का खरोश
एक नई जीस्त का दर बाज किया चाहता है
अज्मे-आजादि-ए-इंसां-ब-हजारां जबरूत
एक नए दौर का आगाज किया चाहता है

बरतर-अकवाम के माजूर खुदाओं से कहो
आखिरी बार जरा अपना तराना दुहराएं
और फिर अपनी सियासत पे पशेमां होकर
अपने नापाक इरादों का कफन ले आएं

सुर्ख तूफान की मौजों को जकड़ने के लिए
कोई जंजीरे-गिरां काम नहीं आ सकती
रक्स करती हुई किरनों के तलातुम की कसम
अर्सए-दहर पे अब शाम नहीं छा सकती

ख़ुदकुशी से पहले

उफ़ ये बेदर्द सियाही ये हवा के झोंके
किस को मालूम है इस शब की सहर हो कि न हो
इक नज़र तेरे दरीचे की तरफ़ देख तो लूँ
डूबती आँखों में फिर ताब-ए-नज़र हो कि न हो

अभी रौशन हैं तिरे गर्म शबिस्ताँ के दिए
नील-गूँ पर्दों से छनती हैं शुआएँ अब तक
अजनबी बाँहों के हल्क़े में लचकती होंगी
तेरे महके हुए बालों की रिदाएँ अब तक

सर्द होती हुई बत्ती के धुएँ के हमराह
हाथ फैलाए बढ़े आते हैं ओझल साए
कौन पोंछे मिरी आँखों के सुलगते आँसू
कौन उलझे हुए बालों की गिरह सुलझाए

आह ये ग़ार-ए-हलाकत ये दिए का महबस
उम्र अपनी इन्ही तारीक मकानों में कटी
ज़िंदगी फ़ितरत-ए-बे-हिस की पुरानी तक़्सीर
इक हक़ीक़त थी मगर चंद फ़सानों में कटी

कितनी आसाइशें हँसती रहीं ऐवानों में
कितने दर मेरी जवानी पे सदा बंद रहे
कितने हाथों ने बुना अतलस-ओ-कमख़्वाब मगर
मेरे मल्बूस की तक़दीर में पैवंद रहे

ज़ुल्म सहते हुए इंसानों के इस मक़्तल में
कोई फ़र्दा के तसव्वुर से कहाँ तक बहले
उम्र भर रेंगते रहने की सज़ा है जीना
एक दो दिन की अज़िय्यत हो तो कोई सह ले

वही ज़ुल्मत है फ़ज़ाओं पे अभी तक तारी
जाने कब ख़त्म हो इंसाँ के लहू की तक़्तीर
जाने कब निखरे सियह-पोश फ़ज़ा का जौबन
जाने कब जागे सितम-ख़ुर्दा बशर की तक़दीर

अभी रौशन हैं तिरे गर्म शबिस्ताँ के दिए
आज मैं मौत के ग़ारों में उतर जाऊँगा
और दम तोड़ती बत्ती के धुएँ के हमराह
सरहद-ए-मर्ग-ए-मुसलसल से गुज़र जाऊँगा

ये किसका लहू है?

ये किसका लहू है कौन मरा
ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा.

ये जलते हुए घर किसके हैं
ये कटते हुए तन किसके है,
तकसीम के अंधे तूफ़ान में
लुटते हुए गुलशन किसके हैं,
बदबख्त फिजायें किसकी हैं
बरबाद नशेमन किसके हैं,

कुछ हम भी सुने, हमको भी सुना.

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा.

किस काम के हैं ये दीन धरम
जो शर्म के दामन चाक करें,
किस तरह के हैं ये देश भगत
जो बसते घरों को खाक करें,
ये रूहें कैसी रूहें हैं
जो धरती को नापाक करें,

आँखे तो उठा, नज़रें तो मिला.

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा.

जिस राम के नाम पे खून बहे
उस राम की इज्जत क्या होगी,
जिस दीन के हाथों लाज लूटे
उस दीन की कीमत क्या होगी,
इन्सान की इस जिल्लत से परे
शैतान की जिल्लत क्या होगी,

ये वेद हटा, कुरआन उठा.

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा

मेरे गीत तुम्हारे हैं

अब तक मेरे गीतों में उम्मीद भी थी पसपाई भी
मौत के क़दमों की आहट भी, जीवन की अंगड़ाई भी
मुस्तकबिल की किरणें भी थीं, हाल की बोझल ज़ुल्मत भी
तूफानों का शोर भी था और ख्वाबों की शहनाई भी

आज से मैं अपने गीतों में आतश–पारे भर दूंगा
मद्धम लचकीली तानों में जीवन–धारे भर दूंगा
जीवन के अंधियारे पथ पर मशअल लेकर निकलूंगा
धरती के फैले आँचल में सुर्ख सितारे भर दूंगा
आज से ऐ मज़दूर-किसानों! मेरे राग तुम्हारे हैं
फ़ाकाकश इंसानों! मेरे जोग बिहाग तुम्हारे हैं
जब तक तुम भूके-नंगे हो, ये शोले खामोश न होंगे
जब तक बे-आराम हो तुम, ये नगमें राहत कोश न होंगे

मुझको इसका रंज नहीं है लोग मुझे फ़नकार न मानें
फ़िक्रों-सुखन के ताजिर मेरे शे’रों को अशआर न मानें
मेरा फ़न, मेरी उम्मीदें, आज से तुमको अर्पन हैं
आज से मेरे गीत तुम्हारे दुःख और सुख का दर्पन हैं

तुम से कुव्वत लेकर अब मैं तुमको राह दिखाऊँगा
तुम परचम लहराना साथी, मैं बरबत पर गाऊंगा
आज से मेरे फ़न का मकसद जंजीरें पिघलाना है
आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊंगा

नूरजहाँ की मज़ार पर

पहलू-ए-शाह में ये दुख़्तर-ए-जमहूर की क़बर
कितने गुमगुश्ता फ़सानों का पता देती है
कितने ख़ूरेज़ हक़ायक़ से उठाती है नक़ाब
कितनी कुचली हुइ जानों का पता देती है

कैसे मग़्रूर शहन्शाहों की तस्कीं के लिये
सालहासाल हसीनाओं के बाज़ार लगे
कैसे बहकी हुई नज़रों की तय्युश के लिये
सुर्ख़ महलों में जवाँ जिस्मों के अम्बार लगे

कैसे हर शाख से मुंह बंद महकती कलियाँ
नोच ली जाती थीं तजईने=हरम की खातिर
और मुरझा के भी आजादन हो सकती थीं
जिल्ले-सुबहान की उल्फत के भरम की खातिर

कैसे इक फर्द के होठों की ज़रा सी जुम्बिश
सर्द कर सकती थी बेलौस वफाओं के चिराग
लूट सकती थी दमकते हुए माथों का सुहाग
तोड़ सकती थी मये-इश्क से लबरेज़ अयाग

सहमी सहमी सी फ़िज़ाओं में ये वीराँ मर्क़द
इतना ख़ामोश है फ़रियादकुना हो जैसे
सर्द शाख़ों में हवा चीख़ रही है ऐसे
रूह-ए-तक़दीस-ओ-वफ़ा मर्सियाख़्वाँ हो जैसे

तू मेरी जाँ हैरत-ओ-हसरत से न देख
हम में कोई भी जहाँ नूर-ओ-जहांगीर नहीं
तू मुझे छोड़िके ठुकरा के भी जा सकती है
तेरे हाथों में मेरा सात है ज़न्जीर नहीं

 जागीर

फिर उसी वादी-ए-शादाब में लौट आया हूँ
जिस में पिन्हाँ मिरे ख़्वाबों की तरब-गाहें हैं
मेरे अहबाब के सामान-ए-ताय्युश के लिए
शोख़ सीने हैं जवाँ जिस्म हसीं बाँहें हैं
सब्ज़ खेतों में ये दुबकी हुई दोशीज़ाएँ
इन की शिरयानों में किस किस का लहू जारी है
किस में जुरअत है कि इस राज़ की तशहीर करे
सब के लब पर मिरी हैबत का फ़ुसूँ तारी है
हाए वो गर्म ओ दिल-आवेज़ उबलते सीने
जिन से हम सतवत-ए-आबा का सिला लेते हैं
जाने उन मरमरीं जिस्मों को ये मरियल दहक़ाँ
कैसे इन तेरह घरोंदों में जनम देते हैं
ये लहकते हुए पौदे ये दमकते हुए खेत
पहले अज्दाद की जागीर थे अब मेरे हैं
ये चारा-गाह ये रेवड़ ये मवेशी ये किसान
सब के सब मेरे हैं सब मेरे हैं सब मेरे हैं
इन की मेहनत भी मिरी हासिल-ए-मेहनत भी मिरा
इन के बाज़ू भी मिरे क़ुव्वत-ए-बाज़ू भी मिरी
मैं ख़ुदावंद हूँ उस वुसअत-ए-बे-पायाँ का
मौज-ए-आरिज़ भी मिरी निकहत-ए-गेसू भी मिरी
मैं उन अज्दाद का बेटा हूँ जिन्हों ने पैहम
अजनबी क़ौम के साए की हिमायत की है
उज़्र की साअत-ए-नापाक से ले कर अब तक
हर कड़े वक़्त में सरकार की ख़िदमत की है
ख़ाक पर रेंगने वाले ये फ़सुर्दा ढाँचे
इन की नज़रें कभी तलवार बनी हैं न बनीं
इन की ग़ैरत पे हर इक हाथ झपट सकता है
इन के अबरू की कमानें न तनी हैं न तनीं
हाए ये शाम ये झरने ये शफ़क़ की लाली
मैं इन आसूदा फ़ज़ाओं में ज़रा झूम न लूँ
वो दबे पाँव इधर कौन चली जाती है
बढ़ के उस शोख़ के तर्शे हुए लब चूम न लूँ

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