तरु पर कुहुक उठी पड़कुलिया-विश्वप्रिया-चिन्ता अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

तरु पर कुहुक उठी पड़कुलिया-विश्वप्रिया-चिन्ता अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

तरु पर कुहुक उठी पड़कुलिया-
मुझ में सहसा स्मृति-सा बोला-
गत वसन्त का सौरभ, छलिया।
किसी अचीन्हे कर ने खोला-
द्वार किसी भूले यौवन का-
फूटा स्मृति संचय का फोला।
लगा फेरने मन का मनका
पर हा, यह अनहोनी कैसी-
बिखर गया सब धन जीवन का!
जीवन-माला पहले जैसी-
किन्तु एक ही उस में दाना-
तू निरुपम थी, अपने ऐसी!
तेरा कहा न मैं ने माना-
‘भर लो अपनी अनुभव-डलिया।’
निरुपम! अब क्या रोना-गाना!
धूल, धूल मधु की रंगलिया!
परिचित भी तू रही अचीन्ही-
तरु पर कुहुक उठी पड़कुलिया!

डलहौजी, 9 सितम्बर, 1934

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