तराना-१-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

तराना-१-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे
इक खेत नहीं इक देश नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे

यां सागर-सागर मोती हैं यां परबत-परबत हीरे हैं
ये सारा माल हमारा है हम सारा ख़जाना मांगेंगे

जो ख़ून बहा जो बाग़ उजड़े जो गीत दिलों में कत्ल हुए
हर कतरे का हर गुंचे का हर गीत का बदला मांगेंगे

ये सेठ बयौपारी रजवाड़े दस लाख तो हम दस लाख करोड़
ये कितने दिन अमरीका से जीने का सहारा मांगेंगे

जब सफ़ सीधी हो जायेगी जब सब झगड़े मिट जायेंगे
हम हर इक देश के झंडे पर इक लाल सितारा मांगेंगे

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