तराना-राम प्रसाद बिस्मिल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ram Prasad Bismil

तराना-राम प्रसाद बिस्मिल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ram Prasad Bismil

बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से।
लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।

लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।

खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी,
ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से।

कभी ओ बेख़बर तहरीके़-आज़ादी भी रुकती है?
बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से।

यहां तक सरफ़रोशाने-वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल,
कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो-चार फांसी से।

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