तराना-दस्ते सबा -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

तराना-दस्ते सबा -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएंगे
कुछ अपनी सज़ा को पहुंचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएंगे

ऐ ख़ाक-नशीनों उठ बैठो, वो वकत करीब आ पहुंचा है
जब तख़त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे

अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें, अब ज़िन्दानों की ख़ैर नहीं
जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएंगे

कटते भी चलो,बढ़ते भी चलो, बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो कि अब डेरे मंजिल ही पे डाले जाएंगे

ऐ ज़ुल्म के मातो, लब खोलो, चुप रहने वालो, चुप कब तक
कुछ हशर तो इनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जाएंगे

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