तंबीहुल गाफ़िलीन-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

तंबीहुल गाफ़िलीन-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

जहां है जब तलक यां सैकड़ों शादीयो-ग़म होंगे।
हज़ारों आशिक़े जां बाज़ और लाखों सनम होंगे॥
किनारो-बोस और ऐशो-तरब, भी दम बदम होंगे।
मगर जितने यह अपनी सफ़ के हैं यह सब अदम होंगे॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥1॥

तुम्हारा अब है जितना, हुस्न का आलम ग़नीमत है।
अगर है बेश तो बेहतर, वगरना कम ग़नीमत है॥
हमारा देखना और आशिक़ी का दम ग़नीमत है।
भरोसा कुछ नहीं दम का, अज़ीज़ों दम ग़नीमत है॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥2॥

चमन में चल के बैठो, और सुराही जाम मंगवाओ।
पियो भर-भर के सागर तुम भी, और हमको भी पिलवाओ॥
गले लिपटो हमारे, और हमें हंस हंस के बोसा दो।
अजल काफ़िर खड़ी है सर पे ऐ! दिलदार सुनते हो॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥3॥

हमारी चश्म में आए तुम्हारे आरिज़ गुलगूं।
ग़रज तुम वक़्त के लैला हो प्यारे और हम मजनूं॥
घड़ी भर बैठ कर हम पास कर लो ऐशे बू कलमूं।
किसी के कहने सुनने पर न जाओ देखो कहता हूं॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥4॥

उछल लो, कूद लो, है जब तलक यह ज़ोर नलियों में।
ग़नीमत है वही दम, अब जो गुज़रे रंग रलियों में॥
हमें लो साथ और सैरें करो, फूलों की कलियों में।
फिरेगी फिर तो आखिर तन की उड़ती ख़ाक गलियों में॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥5॥

अगर सीना हमारा तुमने चक्की की तरह राहा।
तो अब जल्दी गले मिलकर, लगादो ऐश का फ़ाहा॥
मुए पर किसने पूछा दिलबरो और किस ने फिर चाहा।
हमें तो रोना आता है, यही कह कर, अहा! हा! हा!॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥6॥

जो आगे आशिको-माशूक थे सब मिल गए गिल में।
अजल की तेग़ से दोनों के तुक्के उड़ गए तिल में॥
न क़ातिल में रहा जी और न उस क़ातिल के बिस्मिल में।
तो बस ऐ दिलबरों! तुम भी यही अब जान लो दिल में॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥7॥

अगर तुमने हमारे दिल को दुःख दे देके तरसाया।
ग़लत फ़हमी तुम्हारी याकि जिसने तुमको सिखलाया॥
गया जब वक़्त काफ़िर हाथ से फिर हाथ कब आया।
ग़रज हमने तो अब भी और तुम्हें आगे भी समझाया॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥8॥

हमारे और तुम्हारे हक़ में है अब तो यही बेहतर।
कि देखें चांदनी और सैर दरिया की करें जाकर॥
कभी लिपटें गले से, और कभी मै के पियें साग़र।
यही कहने को रह जावेगा आखि़र ऐ मेरे दिलबर॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥9॥

अगर वरसात हो या अब्र हो, या मेंह बरसता हो।
पहन पोशाक रंगी और हमारे बर में आ बैठो॥
अदाओ-नाज़ो-ग़मजे़, चोंचले करने हो सो कर लो।
फ़लक कब चैन देता है, मेरी जां फिर तो आखिर को॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥10॥

ऊधर वां हुस्न की मस्ती, इधर यां इश्क की रै है।
चमन है अब्र है, साक़ी सुराही, जाम और मै है॥
जो करना हो सो कर लो, इस घड़ी सब ऐश की शै है।
ग़ज़ब है, क़हर है, जब जी निकल जावेगा फिर ऐ है॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥11॥

अभी यां उल्फ़तें बढ़ती हैं और वां नाज़ की घातें।
ग़नीमत हैं तमाचे प्यार के और चाह की लातें॥
जब आंखें मुंद गई, सब हो चुकीं चितवन इशारातें।
कहां फिर दिन मजे़ के और कहां यह ऐश की रातें॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥12॥

हमें है बेकरारी और तुम्हें हरदम तरहदारी।
ग़नीमत है हमारी और तुम्हारी गर्म बाज़ारी॥
“नज़ीर” अब क्या कहे आगे ग़रज आखि़र व लाचारी।
कहां फिर हम, कहाँ फिर तुम, कहाँ उल्फ़त, कहाँ यारी॥
न यह चुहलें, न यह धूमें, न यह चर्चे बहम होंगे।
मियां! एक दिन वह आवेगा, न तुम होगे न हम होंगे॥13॥

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