डोली-मेरी कविता मेरे गीत(डोगरी कविता)-पद्मा सचदेव-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Padma Sachdev(अनुवादिका: पद्मा सचदेव) 

डोली-मेरी कविता मेरे गीत(डोगरी कविता)-पद्मा सचदेव-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Padma Sachdev(अनुवादिका: पद्मा सचदेव)

अंधेरा पहाड़ी के ऊपर सहम-सहम कर चढ़ रहा है
पर्वतों की चोटियों पर चाँद का प्रकाश छन-छन कर आ रहा है
पहरा देते वृक्ष सुबह होने की प्रतीक्षा में हैं
इस जगह का सुनसान वातावरण किसी आशा में स्तब्ध है
हाथ को हाथ नहीं सुझाई देता, कान में कोई आवाज नहीं पड़ती
क्या रानी क्या दासी सभी साँस रोके प्रतीक्षा में हैं
पहाड़ के पीछे से चाँद हँसता हुआ धीरे-धीरे ऐसे उगता है
जैसे नई दुलहिन मुँह दिखाने के लिए धीरे-धीरे घृंघट उठा रही हो
यह वासन्ती चाँद इसका अंग-अंग पीला है
किसी के वियोग में सूखकर कांटा हो गया है
या हो सकता है तपेदिक ने इसका ऐसा हाल किया हो
किसी का दिया हुआ शाप प्रत्यक्ष फल रहा है
जैसे जल्दी में कहार मेरी डोली लेकर दौड़ते हैं
वैसी ही जल्दी में ये भी संग-संग चलता है

इस राह में इतनी सुनसान है
कि कोई पत्ता तक नही हिलता
कहार जब तेजी से कदम उठाते हैं
तो मेरा मन काँप-काँप जाता है
इस अंधेरे में मैं वह हाथ ढूंढ रही हूँ
जो फेरों के समय मेरे हाथ में था
वह शब्द ढूंढ रही हूँ
जो आहुतियों के संग बोले गए थे
मैं वह गठबंधन ढूंढ रही हूँ
जो इस जीवन के साथ निभना है
मैं वह कहानी ढूंढ़ रही हूँ
जिसे यह कलम लिखेगी

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