डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 1

डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 1

अफ़लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर

अफ़लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर
करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर

अहवाल-ए-मुहब्बत में कुछ फ़रक नहीं ऐसा
सोज़-ओ-तब-ओ-ताब अव्वल, सोज़-ओ-तब-ओ-ताब आख़िर

मैं तुझको बताता हूं तकदीर-ए-उमस कया है
शमशीर-ए-सनां अव्वल, ताऊस-ओ-रबाब आख़िर

मैख़ाना-ए-यूरोप के दसतूर निराले हैं
लाते हैं सुरूर अव्वल, देते हैं शराब आख़िर

कया दबदबा-ए-नादिर, कया शौकत-ए-तैमूरी
हो जाते हैं सब दफ़तर गरके-मये-नाब आख़िर

था ज़बत बहुत मुशकिल इस मील मुआनी का
कह डाले कलन्दर ने इसरार-ए-किताब आख़िर

अनोखी वज़य है सारे ज़माने से निराले हैं

अनोखी वज़य है सारे ज़माने से निराले हैं
ये आशिक कौन सी बसती के या रब ! रहने वाले हैं ?

इलाजे-दरद में भी दरद की लज़्ज़त पे मरता हूं
जो थे छालों में कांटे नोक-ए-सूज़न से निकाले हैं

फला फूला रहे या रब ! चमन मेरी उम्मीदों का
जिगर का ख़ून दे दे कर ये बूटे मैंने पाले हैं

रुलाती है मुझे रातों को ख़ामोशी सितारों की
निराला इशक है मेरा, निराले मेरे नाले हैं

न पूछो मुझसे लज़्ज़त ख़ानुमां-बरबाद रहने की
नशेमन सैंकड़ों मैंने बनाकर फूंक डाले हैं

नहीं बेगानगी अच्छी रफ़ीके-राहे-मंज़िल से,
ठहर जा ऐ शरर ! हम भी तो आख़िर मिटने वाले हैं

उमीदे-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है, वायज़ को,
ये हज़रत देखने में सीधे-सादे भोले-भाले हैं

मेरे अशयार ऐ ‘इकबाल’ कयूं पयारे न हों मुझ को ?
मेरे टूटे हुए दिल के ये दरद-अंगेज़ नाले हैं

औरत

वजूदे जन से है तसवीरे कायनात में रंग
इसी के साज़ से है ज़िन्दगी का सोज़े दरूं

शरफ़ में बड़ के सुरया से मुशते ख़ाक उसी की
कि हर शरफ़ है उसी दुरज का दुरे मकनूं

मुकालमाते फ़लातूं न लिख सकी लेकिन
उसी के शोले से टूटा शरारे अफ़लातूं

 चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया

चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया
ख़ूने-सद नौबहार है दुनिया

जान लेती है जुसतजू इसकी
दौलते-ज़ेरे-मार है दुनिया

ज़िन्दगी नाम रख दीया किसने
मौत का इंतज़ार है दुनिया

ख़ून रोता है शौक मंज़िल का
रहज़ने-रहगुज़ार है दुनिया

 दुर्राज की परवाज़ में है शौकत-ए-शाहीं

दुर्राज की परवाज़ में है शौकत-ए-शाहीं
हैरत में है सय्याद येह शाहीं है कि दुर्राज

हर कौम के अफ़कार में पैदा है तलातुम
मशरिक में है फ़रदाए कयामत की नमूद आज

फ़िकर के तकाज़ों से हूआ हशर पे मज़बूर
वोह मुरदा कि था बांग-ए-सराफ़ील का मोहताज

 एक नौजवान के नाम

तेरे सोफ़े हैं अफ़रंगी तेरे कालीं हैं ईरानी
लहू मुझ को रुलाती है जवानों की तन आसानी

इमारत कया शुकोह-ए-खुसरवी भी हो तो कया हासिल
न ज़ोर-ए-हैदरी तुझ में न इसतग़ना-ए-सलमानी

न ढूंड इस चीज़ को तहज़ीब-ए-हाज़िर की तजल्ली में
कि पाया मैंने इसतग़ना में मेराज-ए-मुसलमानी

उकाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
नज़र आती है उनको अपनी मंज़िल आसमानों में

न हो नाउमीद, नाउमीदी ज़वाल-ए-इलम-ओ-इरफ़ां है
उमीद-ए-मरद-ए-मोमिन है ख़ुदा के राज़दानों में

नहीं तेरा नशेमन कसर-ए-सुलतानी के गुम्बद पर
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में

ग़ुलामी कया है ज़ौक-ए-हुस्न-ओ-ज़ेबायी से महरूमी

ग़ुलामी कया है ज़ौक-ए-हुस्न-ओ-ज़ेबायी से महरूमी
जिसे ज़ेबा कहें आज़ाद बन्दे है वही ज़ेबा

भरोसा कर नहीं सकते ग़ुलामों की बसीरत पर
कि दुनिया में फ़कत मरदान-ए-हुर की आंख है बीना

वही है साहब-ए-इमरोज़ जिसने अपनी हिंमत से
ज़माने के समन्दर से निकाला गौहर-ए-फ़रदा

फ़रंगी शीशागर के फ़न से पत्थर हो गये पानी
मेरी अकसीर ने शीशे को बख़शी सख़ती-ए-खारा

रहे हैं और हैं फ़िरऔन मेरी घात में अब तक
मगर कया ग़म कि मेरी आसतीं में है यद-ए-बैज़ा

वोह चिंगारी ख़स-ओ-खशाक से किस तरह दब जाये
जिसे हक ने कीया हो नेसतां के वासते पैदा

मुहब्बत खावेशतां बीनी, मुहब्बत खावेशतां दारी
मुहब्बत असतान-ए-कैसर-ओ-कसरा से बेपरवाह

अजब कया गर मह-ओ-परवीं मेरे नखचीर हो जाएं
‘कि बर फ़तराक-ए-साहब दौलते बिसतम सर-ए-खुद रा’

वोह दाना-ए-सुबुल, ख़तम-उर रसूल, मौला-ए-कुल जिस ने
ग़ुबार-ए राह को बख़शा फ़रोग-ए-वादी-ए-सीना

निगाह-ए-इशक-ओ-मसती में वही अव्वल वही आख़िर
वही कुरआन, वही फ़ुरकां वही यासीन, वही ताहा

सानायी के आदाब से मैंने गावासी न की वरना
अभी इस बहर में बाकी हैं लाखों लुलूआए लाला

हर चीज़ है महव-ए-ख़ुद नुमाई

हर चीज़ है महव-ए-ख़ुद नुमाई
हर ज़र्रा शहीद-ए-किबरियायी

बे-ज़ौक-ए-नमूद ज़िन्दगी, मौत
तामीर-ए-ख़ुदी मैं है खुदाई

रायी ज़ोर-ए-ख़ुदी से परबत
परबत ज़ुआफ़-ए-ख़ुदी से रायी

तारे आवारा-ओ-कम मेज़
तकदीर-ए-वुज़ूद है जुदाई

येह पिछले पहर का ज़रदरू चेहरा
बे राज़-ओ-न्याज़-ए-आशनाई

तेरी कन्दील है तेरा दिल
तू आप है अपनी रौशनाई

एक तू है कि हक है इस जहां में
बाकी है नमूद-ए-सीमीयाई

हैं औकदाह कुशा येह ख़ार-ए-सहरा
कम कर गिला-ए-बरहना पायी

इनसान-कुदरत का अजीब येह सितम है

इनसान को राज़ जु बनाया
राज़ उस की निगाह से छुपाया
बेताब है ज़ौक आगही का
खुलता नहीं भेद ज़िन्दगी का

हैरत-ए-आग़ाज़-ओ-इंतेहा है
आईने के घर में और कया है

है ग़रम ख़ुराम-ए-मौज-ए-दरीया
दरीया सूए बहर जादा-ए-पैमां

बादल को हवा उड़ा रही है
शानों पे उठाए ला रही है

तारे मसत-ए-शराब-ए-तकदीर
ज़िन्दान-ए-फ़लक में पा-ब-ज़ंजीर

खुरशीद वोह आबिद-ए-सहर खेज़
लाने वाला पयाम-ए-बरख़ेज़

मग़रिब की पहाड़ीयों में छुप कर
पीता है मय शफ़क का सागर

लज़्ज़त गीर-ए-वजूद हर शैअ
सर मसत-ए-मय नुमूद हर शैअ

कोयी नहीं ग़मगुसार-ए-इनसां
कया तलख़ है रोज़गार-ए-इनसां

जवानों को मेरी आह-ए-सहर दे

जवानों को मेरी आह-ए-सहर दे
फिर इन शाहीं बच्चों को बाल-ओ-पर दे
ख़ुदाया आरज़ू मेरी यही है
मेरा नूर-ए-बसीरत आम कर दे

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