डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 9

डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल  -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 9

न तू ज़मीं के लीए है न आसमां के लीए

न तू ज़मीं के लीए है न आसमां के लीए
जहां है तेरे लीए तू नहीं जहां के लीए

मकामे परवरिश-ए आह-ओ-नाला है ये चमन
ना सैरो गुल के लीए है न आशियां के लीए

निशने राह दिखाते थे जो सितारों को
तरस गये हैं किसी मरदे राहदां के लीए

निगह बुलन्द, सुखन दिलनवाज़ जां पुरसोज़
यही है रख़ते सफ़र मीरे कारवां के लीए

ज़रा सी बात थी अन्देशा-ए-अज़म ने उसे
बड़ा दिया है फ़कत ज़ेबे दासतां के लीए

न कर ज़िकर-ए-फ़िराक व आशनाई

न कर ज़िकर-ए-फ़िराक व आशनाई
कि असल ज़िन्दगी है ख़ुद नुमाई

न दरीया का ज़ियां है न गुहर का
दिल दरीया से गौहर की जुदाई

तमीज़ ख़ार व गुल से आशकारा
नसीम सुबह की रौशन ज़मीरी

हफ़ाज़त फूल की मुमकिन नहीं है
अगर कांटे में हो ख़ू-ए-हुरेरी

मुहब्बत

शहीद-ए-मुहब्बत ना काफ़िर ना ग़ाज़ी
मुहब्बत की रसमें ना रूमी ना राज़ी
वोह मुहब्बत नहीं कुछ और शै है
सिखाती है जो ग़ज़नवी को इयाज़ी
तुरकी भी शीरीं ताज़ी भी शीरीं
हरफ़-ए-मुहब्बत ना तुरकी ना ताज़ी

मुल्ला और बहशत

मैं भी हाज़िर था वहां, ज़बत-ए-सुख़न कर न सका
हक से जब हज़रत-ए-मुल्ला को मिला हुकम-ए-बहशत

अरज़ की मैंने इलाही मेरी तकसीर मआफ़
ख़ुश न आयेंगे इसे हूर-ओ-शराब-ओ-लब-ए-किशत

नहीं फ़िरदौस मकाम-ए-जदल-ओ-कौल-ओ-अकल
बहस-ओ-तकरार इस अल्लाह के बन्दे की सरिशत

है बदआमेज़ी-ए-अकवाम-ए-मिलल काम इसका
और जन्नत में न मसजिद, न कलीसा, न कुनिशत

कया इशक एक ज़िन्दगी-ए-मसतार का

कया इशक एक ज़िन्दगी-ए-मसतार का
कया इशक पायेदार से ना-पायेदार का

वहो इशक जिस की शमा बुझा दे अजल की फूंक
उस में मज़ा नहीं तपिश-ओ-इंतेज़ार का

मेरी बिसात कया है, तब-ए-ताब यक नफ़स
शोले से बेमहल है उलझना शरार का

कर पहले मुझ को ज़िन्दगी-ए-जाविदां अता
फिर ज़ौक-ओ-शौक देख दिल-ए-बेकरार का

कांटा वोह दे कि जिस की खटक ला-ज़वाल हो
या रब ! वोह दरद जिस की कसक ला-ज़वाल हो

खुला जब चमन में कुतबख़ाना-ए-गुल

खुला जब चमन में कुतबख़ाना-ए-गुल
न काम आया मुल्ला को इलम-ए-किताबी

मतानत शिकन थी हवा-ए-बहारां
ग़ज़ल ख़वां हूआ पीराक-ए-अन्दराबी

कहा लाला-ए-आतिशीं पैरहन ने
कि असरार-ए-जां की हूं मैं बेहजाबी

समझता है मौत जो ख़वाब-ए-लहद को
नेहां उस की तामीर में है ख़राबी

नहीं ज़िन्दगी सिलसिला रोज़-ओ-शब का
नहीं ज़िन्दगी मसती-ओ-नीम ख़वाबी

हयात असत दर आतिश-ए-ख़ुद तपेयदां
ख़ुश आं दम कि आयेन नुकता रा बाज़याबी

अगर ज़ा आतिश-ए-दिल शराराए बगीरीरी
तवान करद ज़ेर-ए-फ़लक अफ़ाबी

ख़िरद मन्दों से कया पूछूं के मेरी इबतदा कया है

ख़िरद मन्दों से कया पूछूं के मेरी इबतदा कया है
के मैं इस फ़िकर में रहता हूं, मेरी इंतहा कया है

ख़ुदी को कर बुलन्द इतना के हर तकदीर से पहले
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा कया है

मकाम-ए-गुफ़तगू कया है अगर मैं कीमियागर हूं
यही सोज़-ए-नफ़स है और मेरी कीमिया कया है

नज़र आएं मुझे तकदीर की गहराईआं इस में
ना पूछ ऐ हमनशीं मुझसे वो चशम-ए-सुरमा सा कया है

अगर होता वो मजज़ूब फ़िरंगी इस ज़माने में
तो ‘इकबाल’ उस को समझाता मकाम-ए-किबर्या कया है

नवाए सुबहगायी ने जिगर-खूं कर दीया मेरा
ख़ुदाया जिस ख़ता की यह सज़ा है वोह ख़ता कया है

Leave a Reply