डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 10

डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 10

नानक

कौम ने पैग़ामे गौतम की ज़रा परवाह न की
कदर पहचानी न अपने गौहरे यक दाना की

आह ! बदकिसमत रहे आवाज़े हक से बेख़बर
ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर

आशकार उसने कीया जो ज़िन्दगी का राज़ था
हन्द को लेकिन ख़याली फ़लसफ़े पर नाज़ था

शमएं-हक से जो मुनव्वर हो ये वो महफ़िल न थी
बारिशे रहमत हूयी लेकिन ज़मीं काबिल न थी

आह ! शूदर के लीए हिन्दुसतान ग़म ख़ाना है
दरदे इनसानी से इस बसती का दिल बेगाना है

ब्रहमन शरशार है अब तक मये पिन्दार में
शमएं गौतम जल रही है महफ़िले अग़यार में

बुतकदा फिर बाद मुद्दत के रौशन हूआ
नूरे इबराहीम से आज़र का घर रौशन हूआ

फिर उठी आख़िर सदा तौहीद की पंजाब से
हन्द को इक मरदे कामिल ने जगाया ख़ाब से

मुझे आह-ओ-फ़ुग़ां-ए-नीम शब का फिर पयाम आया

मुझे आह-ओ-फ़ुग़ां-ए-नीम शब का फिर पयाम आया
थम ऐ रहरो कि शायद कोयी मुशकिल मकाम आया

ज़रा तकदीर की गहराईयों में डूब जा तू भी
कि इस जंगाह से मैं बन के तेग़-ए-बे-नियाम आया

येह मिसरा लिख दीया किस शोख़ ने मेहराब-ए-मसजिद पर
येह नादां गिर गये सजदों में जब वकत-ए-कयाम आया

चल ऐ मेरी ग़रीबी का तमाशा देखने वाले
वोह महफ़िल उठ गयी जिस दम तो मुझ तक दौर-ए-जाम आया

दीया इकबाल ने हिन्दी मुसलमानों को सोज़ अपना
येह इक मरद-ए-तन आसां था, तन आसानों के काम आया

इसी इकबाल की मैं जुसतजू करता रहा बरसों
बड़ी मुद्दत के बाअद आख़िर वोह शाहीं ज़ेर-ए-दाम आया

मौत है एक सख़त तर जिस का ग़ुलामी है नाम

मौत है एक सख़त तर जिस का ग़ुलामी है नाम
मकर-ओ-फ़न-ए-ख़ुवाजगी काश समझता ग़ुलाम !

शरा-ए-मलूकाना में जिद्दत-ए-अहकाम देख
सूर का ग़ोग़ा हिलाल, हशर की लज़्ज़त हराम !

देख ग़ुलामी से रूह तेरी है मुज़महल
सीना-ए-बे-सोज़ में ढूंड ख़ुदी का मकाम !

मकतबों में कहीं रानायी-ए-अफ़कार भी है ?

मकतबों में कहीं रानायी-ए-अफ़कार भी है ?
ख़ानकाहों में कहीं लज़्ज़त-ए-असरार भी है ?

मंज़िल-ए-रहरवां दूर भी दुशवार भी है
कोयी इस काफ़ले में काफ़ला सलार भी है ?

बड़्ह के ख़ैबर से है येह मारका-ए-दीन-ओ-वतन
इस ज़माने में कोयी हैदर-ए-करार भी है ?

इलम की हद से परे, बन्दा-ए-मोमिन के लीये
लज़्ज़त-ए-शौक भी है, नेमत-ए-दीदार भी है ?

पीर-ए-मैख़ाना येह कहता है कि ऐवान-ए-फ़रंग
सुसत बुनियाद भी है, आईना दीवार भी है

लाऊं वो तिनके कहां से आशियाने के लीए

लाऊं वो तिनके कहां से आशियाने के लीए
बिजलीयां बेताब हैं जिन को जलाने के लीए

वाए नाकामी ! फ़लक ने ताक कर तोड़ा उसे
मैंने जिस डाली को ताड़ा आशियाने के लीए

आंख मिल जाती है हफ़तादु-दो-मिल्लत से तेरी
एक पैमाना तेरा सारे ज़माने के लीए

दिल में कोयी इस तरह की आरज़ू पैदा करूं
लौट जाए आसमां मेरे मिटाने के लीए

जमा कर ख़िरमन तो पहले दाना दाना चुनके तू
आ ही निकलेगी कोयी बिजली जलाने के लीए

पास था नाकामीए-सय्याद का ऐ हम-सफ़ीर !
वरना मैं, और उड़ के आता एक दाने के लीए ?

इस चमन में मुरग़े-दिल गाए न आज़ादी के गीत
आह ! ये गुलशन नहीं ऐसे तराने के लीए

कया कहूं, ऐसे चमन से मैं जुदा कयोंकर हुआ

कया कहूं, ऐसे चमन से मैं जुदा कयोंकर हुआ ?
और असीरे-हलकए-दामे-हवा कयोंकर हुआ ?

जाय-हैरत है बुरा सारे ज़माने का हूं मैं
मुझ को ये खिलअत शराफ़त का अता कयोंकर हुआ ?

कुछ दिखाने देखने का था तकाज़ा तूर पर
कया ख़बर है तुझ को ऐ दिल ! फ़ैसला कयोंकर हुआ ?

है तलब बे-मुद्दआ होने की भी इक मुद्दआ
मुरग़-ए-दिल दामे-तमन्ना से रहा कयोंकर हुआ ?

देखने वाले यहां भी देख लेते हैं तुझे,
फिर ये वादा हशर का सबर-आज़मा ! कयोंकर हुआ ?

हुस्न-ए-कामिल ही न हो इस बे-हज़ाबी का सबब ?
वुह जो था परदों में पिनहां, ख़ुद-नुमा कयोंकर हुआ ?

मौत का नुसख़ा अभी बाकी है ऐ दरदे-फ़िराक !
चारागर दीवाना है, मैं लादवा कयोंकर हुआ ?

तूने देखा है कभी ऐ दीदए-इबरत ! कि गुल
हो के पैदा ख़ाक से रंगीं-कबा कयोंकर हुआ ?

पुरसिशे-अम्माल से मकसद था रुसवायी मिरी
वरना ज़ाहर था सभी कुछ, कया हुआ ? कयोंकर हुआ ?

मेरे मिटाने का तमाशा देखने की चीज़ थी
कया बताऊं, उन का मेरा सामना कयोंकर हुआ ?

कोशिश-ए-नातमाम

फुरकत-ए-आफ़ताब में खाती है पेच-ओ-ताब सुबह
चशमे शफ़क है ख़ूं-फ़िशां अख़तरे-शाम के लीए

रहती है कैश-ए-रूज़ को लैली-ए-शाम की हवस
अख़तर-ए-सुबह मुज़तरिब ताब दवाम के लीए

कहता था कुतबे-आसमां काफ़िला-ए-नजूम से
हमरहो मैं तरस गया लुतफ़े-ख़िराम के लीए

सोतों को नद्यों का शौक, बहर का नद्यों को इशक
मौजा-ए-बहर की तपिश माहे-तमाम के लीए

हुस्न अज़ल के परदा-ए-लाल-ओ-गुल में हैं नेहां
कहते हैं बे-करार हैं जलवा-ए-आम के लीए

राज़-ए-हयात पूछ ले ख़िज़रे-ख़ुजसता गाम से
ज़िन्दा हर एक चीज़ है कोशिश-ए-नातमाम से

ख़ुदी हो इलम से मुहकम तो ग़ैरत-ए-जिबरील

ख़ुदी हो इलम से मुहकम तो ग़ैरत-ए-जिबरील
अगर हो इशक से मुहकम तो सूर-ए-इसराफ़ील

अज़ाब-ए-दानिश-ए-हाज़िर से बा-ख़बर हूं मैं
कि मैं इस आग में डाला गया हूं मिसल-ए-ख़लील

फ़रेब ख़ुरदाह-ए-मंज़िल है कारवां वरना
ज़्यादा राहत-ए-मंज़िल से है निशात-ए-रहील

नज़र नहीं तो मेरे हलका-ए-सुख़न में न बैठ
कि नुकताह-ए-ख़ुदी हैं मिसाल-ए-तेग़े-असील

मुझे वोह दरस-ए-फ़रंग आज याद आते हैं
कहां हुज़ूर की लज़्ज़त, कहां हिजाब-ए-दलील

अंधेरी शब है, जुदा अपने काफ़ले से है तू
तेरे लीये है मेरा शोला-ए-नवा, कन्दील

ग़रीब-ओ-सादा-ओ-रंगीन है दासतान-ए-हरम
नेहायत इस की हुसैन, इबतदा है इसमाईल

कहूं कया आरज़ू-ए-बेदिली मुझ को कहां तक है

कहूं कया आरज़ू-ए-बेदिली मुझ को कहां तक है ?
मिरे बाज़ार की रौनक ही सौदा-ए-ज़यां तक है ?

वुह मै-कश हूं फ़ुरोग़े-मै से ख़ुद गुलज़ार बन जाऊं
हवाए-गुल फ़िराके-साकीए-ना-मेहरबां तक है

चमन-अफ़रोज़ है, सय्याद मेरी ख़ुश-नवायी तक
रही बिजली की बेताबी, सो मेरे आशयां तक है

वुह मुशते-ख़ाक हूं, फ़ैज़े-परेशानी से सहरा हूं
न पूछो मेरी वुसअत की, ज़मीं से आसमां तक है

जरस हूं नाला ख़वाबीदा है मेरे हर रगो-पै में
ये ख़ामोशी मिरी वकते-रहीले-कारवां तक है

सुकूने दिल से सामाने-कशूदे-कार पैदा कर
कि उकदा ख़ातिरे-गिरदाब का आबे-रवां तक है

चमनज़ारे-मुहब्बत में ख़मोशी मौत है बुलबुल !
यहां की ज़िन्दगी पाबन्दीए-रसमे-फ़ुग़ां तक है

जवानी है तो ज़ौके-दीद भी, लुतफ़े-तमन्ना भी
हमारे घर की आबादी कयामे-मेहमां तक है

ज़माने भर में रुसवा हूं, मगर ऐ वाय नादानी !
समझता हूं कि मेरा इशक मेरे राज़दां तक है

निगाह-ए-फ़कर में शान-ए-सिकन्दरी कया है

निगाह-ए-फ़कर में शान-ए-सिकन्दरी कया है
ख़िराज़ की जो गदा हो वोह कैसरी कया है

बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नाउमीदी
मुझे बता तो सही और काफ़िरी कया है

फ़लक ने उनको अता की है ख़वाजगी कि जिनहें
ख़बर नहीं रविश-ए-बन्दा परवरी कया है

फ़कत निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी कया है

इसी ख़ता से इताब-ए-मलूक है मुझ पर
कि जानता हूं माल-ए-सिकन्दरी कया है

किसे नहीं है तमन्ना-ए-सरवरी, लेकिन
ख़ुदी की मौत हो जिस में वोह सरवरी कया है

ख़ुश आ गई है जहां को कलन्दरी मेरी
वगरना शेयर मेरा कया है शाअरी कया है

रिन्दों को भी मालूम हैं सूफ़ी के कमालात

रिन्दों को भी मालूम हैं सूफ़ी के कमालात
हर चन्द कि मशहूर नहीं इन के करामात

ख़ुद-गीरी-ओ-ख़ुदारी-यो-गुलबांग-ए-‘अनल-उल-हक’
आज़ाद हो सालिक तो हैं येह उस के मकामात

महकूम हो सालिक तो यही उसका ‘हमा ओसत’
ख़ुद मुरदा वा ख़ुद मरकद-ओ-ख़ुद मरग-ए-मफ़ाज़ात

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