डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 6

डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 6

ज़िन्दगी इनसान की एक दम के सिवा कुछ भी नहीं

ज़िन्दगी इनसान की एक दम के सिवा कुछ भी नहीं
दम हवा की मौज है, रम के सिवा कुछ भी नहीं

गुल तबस्सुम कह रहा था ज़िन्दगानी की, मगर
शमा बोली, गिरया-ए-ग़म के सिवा कुछ भी नहीं

राज़े हसती राज़ है जब तक कोयी महरम न हो
खुल गया जिस दम तो महरम के सिवा कुछ भी नहीं

ज़ाईरान-ए-काबा से इकबाल यह पूछे कोई
कया हरम का तोहफ़ा ज़मज़म के सिवा कुछ भी नहीं

ज़माना देखेगा जब मेरे दिल से महशर उठेगा गुफ़तगू का

ज़माना देखेगा जब मेरे दिल से महशर उठेगा गुफ़तगू का
मेरी ख़ामोशी नहीं है, गोया मज़ार है हरफ़े आरज़ू का

जो मौज-ए-दरीया लगी यह कहने सफ़र से कायम है शान मेरी
गौहर यह बोला सदफ़ नशीनी है मुझ को सामान आबरू का

कोयी दिल ऐसा नज़र न आया, न जिस में ख़वाबीदा हो तमन्ना
इलाही तेरा जहान कया है, निगाहख़ाना है आरज़ू का

अगर कोयी शै नहीं है पिनहां तो कयों सरापा तलाश हूं मैं
निगाह को नज़ारे की है तमन्ना, दिल को सौदा है जुसतजू का

र्याज़-ए-हसती के ज़र्रे-ज़र्रे से है मोहब्बत का जलवा पैदा
हकीकते-गुल को तू जो समझे, तो यह भी पैमां है रंग-ओ-बू का

तमाम मज़मून मेरे पुराने, कलाम मेरा ख़ता सरापा
हुनर कोयी देखता है मुझ में तो ऐब है मेरे ऐब-जू का

सपास शरते अदब है वरना करम तेरा है सितम से बड़्हकर
ज़रा सा एक दिल दीया है वो भी फ़रेब खुरदा है आरज़ू का

कमाल वहदत अयां है ऐसा कि नोक-ए-नशतर से तू जो छेड़े
यकीं है मुझ को गिरेगा रगे-गुल से कतरा इनसां के लहू का

ज़माना आया है बे-हजाबी का, आम दीदार-ए-यार होगा

ज़माना आया है बे-हजाबी का, आम दीदार-ए-यार होगा
सकूत था परदादार जिस का वो राज़ अब आशकार होगा

गुज़र गया है अब वो दौर साकी कि छुप छुप के पीते थे पीने वाले
बनेगा सारा जहां मयख़ाना हर कोयी बादाख़वार होगा

कभी जो आवारा-ए-जुनूं थे वो बसत्यों में फिर आ बसेंगे
बरहनापायी वही रहेगी मगर नया ख़ार-ज़ाड़ होगा

सुना दीया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामोशी ने आख़िर
जो अहद सहराईयों से बांधा गया था फिर उसतवार होगा

निकल के सहरा से जिसने रूमा की सलतनत को उलट दीया था
सुना है येह कुदस्यों से मैंने वो शेर फिर होशियार होगा

कीया मेरा तज़किरा जो साकी ने बादाख़वारों की अंजुमन में
तो पीर-ए-मैख़ाना सुन के कहने लगा कि मूंह फट है ख़वार होगा

दयार-ए-मग़रिब के रहने वालो, ख़ुदा की बसती दुकां नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम अय्यार होगा

तुमहारी तहज़ीब अपने ख़ंज़र से आप ही खुदकशी करेगी
जो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशीयाना बनेगा ना-पायेदार होगा

चमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली को
येह जानता है इस दिखावे से दिलजलों में शुमार होगा

जो एक था ऐ निगाह तूने हज़ार करके हमें दिखाया
यही अगर कैफ़ीयत है तेरी तो फिर किसे ऐतबार होगा

ख़ुदा के आशिक तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारे
मैं उसका बन्दा बनूंगा जिस को ख़ुदा के बन्दों से पयार होगा

येह रसम-ए-बज़म-ए-फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भी
रहेगी कया आबरू हमारी जो तू यहां बेकरार होगा

मैं ज़ुलमत-ए-शब में ले के निकलूंगा अपने दरमांदा कारवां को
शरर फ़िसां होगी आह मेरी, नफ़स मेरा शोलाबार होगा

ना पूछ इकबाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ीयत है उसकी
कहीं सर-ए-राह गुज़ार बैठा सितम कश-ए-इंतेज़ार होगा

तेरे शीशे में मय बाकी नहीं है

तेरे शीशे में मय बाकी नहीं है
बता, कया तू मेरा साकी नहीं है
समन्दर से मिले पयासे को शबनम
बखीली है रज़्ज़ाकी नहीं है

तमाम आरिफ़-ओ-आमी ख़ुदी से बेगाना

तमाम आरिफ़-ओ-आमी ख़ुदी से बेगाना
कोयी बताये येह मसजिद है या कि मैख़ाना

येह राज़ हम से छुपाया है मीर वायज़ ने
कि ख़ुद हरम है चिराग़-ए-हरम का परवाना

तिलिसम-ए-बेख़बरी, काफ़िरी-ओ-दींदारी
हदीस-ए-शेख़-ओ-बरहमन फ़ुसूं-ओ-अफ़साना

नसीब-ए-खित्ता हौ या रब वोह बन्दा-ए-दरवेश
कि जिस के फ़िकर में अन्दाज़ हों कलीमाना

छुपे रहेंगे ज़माने की आंख से कब तक
गुहर हैं आब-ए-वूलर के तमाम यकदाना

शायर

कौम गोया जिसम है अफ़राद हैं आज़ा-ए-कौम
मंज़िल-ए-सनअत के रह पैमां हैं दसत-ओ-पा-ए-कौम

महफ़िले-नज़मे-हुकूमत, चेहरा-ए-ज़ेबा-ए-कौम
शायरे-रंगीं नवा है दीदा-ए-बीना-ए-कौम

मुबतिला-ए-दरद कोयी उज़ज हो, रोती है आंख
किस कदर हमदरद सारे जिसम की होती है आंख

कौमों के लीये मौत है मरकज़ से जुदाई

कौमों के लीये मौत है मरकज़ से जुदाई
हो साहब-ए-मरकज़ तो ख़ुदी कया है ख़ुदाई

जो फ़कर हूआ तलख़ी-ए-दैरां का गिलामन्द
उस फ़कर में बाकी है अभी बू-ए-गदाई

उस दौर में भी मरद-ए-ख़ुदा को है मयस्सर
जो मोजज़ा परबत को बना सकता है राई

ख़ुरशीद ! सर-ए-परदा-ए-मशरिक से निकल कर
पहना मेरे कोहसार को मलबूस-ए-हनाई

 

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