डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 8

डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 8

ज़माना

जो था नहीं है जो है न होगा यही है इक हरफ़-ए-मेहरमाना
करीब तर है नमूद जिस की उसी का मुशताक है ज़माना

मेरी सुराही से कतरा कतरा नये हवादिस टपक रहे हैं
मैं अपनी तसबीह-ए-रोज़ का शुमार करता हूं दाना दाना

हर एक से आशना हूं लेकिन, जुदा जुदा रसम-ओ-राह मेरी
किसी का राकिब किसी का मरकब किसी को इबरत का ताज़ियाना

न था अगर तू शरीक-ए-महफ़िल कसूर मेरा है या कि तेरा
मेरा तरीका नहीं कि रख लूं किसी की ख़ातिर मय शबाना

मेरे ख़म-ओ-पेच को नज़ूमी की आंख पहचानती नहीं है
हदफ़ से बेगाना तीर उस का, नज़र नहीं जिस की आरफ़ाना

शफ़क नहीं मग़रबी उफ़क पर येह जू-ए-खूं है, येह जू-ए-खूं है

तुलू-ए-फ़रदा का मुंतज़िर रह के दोश-ओ-इमरोज़ है फ़साना

वोह फ़िकर-ए-ग़ुसताख़ जिस ने उरीयां कीया था फ़ितरत की ताकतों को
उसी की बेताब बिजल्यों से ख़तर में है उसका आशीयाना

हवाएं उनकी फ़जाएं उनकी समुन्दर उनके जहाज़ उनके
गिरह भंवर की खुले तो क्युंकर भंवर है तकदीर का बहाना

जहां-ए-नौ हो रहा है पैदा वोह आलम-ए-पीर मर रहा है
जिसे फ़रंगी मुकामिरों ने बना दीया है किमर ख़ाना

हवा है गो तुन्द-ओ-तेज़ लेकिन चिराग़ अपना जल रहा है
वोह मरद-ए-दरवेश जिसको हक ने दीये हैं अन्दाज़-ए-खुसरवाना

उकाबी शान से जो झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले

उकाबी शान से जो झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले
सितारे शाम को ख़ूने-फ़लक में डूब कर निकले

हुए मदफ़ूने-दरीया ज़ेरे-दरीया तैरने वाले
तमांचे मौज के खाते थे जो बनकर गुहर निकले

ग़ुबारे-रहगुज़र हैं कीमीया पर नाज़ था जिनको
जबीनें ख़ाक पर रखते थे जो अकसीरगर निकले

हमारा नरम-रौ कासिद पयामे-ज़िन्दगी लाया
ख़बर देती थीं जिनको बिजलीयां वो बेख़बर निकले

जहां में अहले-ईमां सूरते-ख़ुरशीद जीते हैं
इधर डूबे उधर निकले, उधर डूबे इधर निकले

तुझे याद कया नहीं है मेरे दिल का वोह ज़माना

तुझे याद कया नहीं है मेरे दिल का वोह ज़माना
वोह अदब गह-ए-मुहब्बत, वोह निगह का ताज़ियाना

येह बुतान-ए-असर-ए-हाज़िर कि बने हैं मदरसे में
न अदाए काफ़िराना न तराश-ए-आज़राना

नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोयी गोशा-ए-फ़राग़त
येह जहां अजब जहां है न कफ़स न आशीयाना

रग-ए-ताक मुंतज़िर है तेरी बारिश-ए-करम की
कि अज़म के मैकदों में न रही मैए मुग़ाना

मेरे हम सफ़र इसे भी असर-ए-बहार समझे
उनहें कया ख़बर कि कया है येह नवाए आशिकाना

मेरे ख़ाक-ओ-ख़ूं से तूने येह जहां कीया है पैदा
सिला-ए-शहीद कया है तब-ओ-ताब-ए-जाविदाना

तेरी बन्दा परवरी से, मेरे दिन गुज़र रहे हैं
न गिला है दोसतों का न शिकायत-ए-ज़माना

तसवीर-ए-दरद

नहीं मिन्नतकश-ए-ताब-ए-शनीदां दासतां मेरी
ख़ामोशी गुफ़तगू है, बे-ज़ुबानी है ज़ुबां मेरी

येह दसतूर-ए-ज़ुबां बन्दी है कैसा तेरी महफ़िल में
यहां तो बात करने को तरसती है ज़ुबां मेरी

उठाये कुछ वरक लाले ने, कुछ नरगिस ने, कुछ गुल ने
चमन में हर तरफ़ बिखरी हुयी है दासतां मेरी

उड़ा ली कुमर्यों ने, तूत्यों ने, अन्दलीबों ने
चमन वालों ने मिल कर लूट ली तरज़-ए-फ़ग़ां मेरी

टपक ऐ शमा आंसू बन कि परवाने की आंखों से
सरापा दरूं हूं, हसरत भरी है दासतां मेरी

इलाही ! फिर मज़ा कया है यहां दुनिया में रहने का
हयात-ए-जाविदां मेरी ना मरग-ए-नागहां मेरी !

मेरा रोना नहीं रोना है येह सारे गुलसितां का
वोह गुल हूं मैं, ख़िज़ां हर गुल की है गोया ख़िज़ां मेरी

“दरीं हसरत सरा उमारिसत अफ़सूं-ए-जरस दरम
ज़ा-फ़ैज़-ए-दिल तपीदां हा खरोश-ए-बे-नफ़स दरम”

मेरी बिगड़ती हुयी तकदीर को रोती है गोयाई
मैं हरफ़-ए-ज़ेर-ए-लब शरमिन्दा’ए गोश-ए-समाअत हूं

परेशां हूं मैं मुशत-ए-ख़ाक, लेकिन कुछ नहीं खुलता
सिकन्दर हूं कि आईना हूं या गरद-ए-कदूरत हूं

येह सब कुछ है मगर हसती मेरी मकसद है कुदरत का
सरापा नूर हो जिसकी हकीकत, मैं वोह ज़ुलमत हूं

ख़ज़ीना हूं छुपाया मुझ को मुशत-ए-ख़ाक-ए-सहरा ने
किसी को कया ख़बर है मैं कहां हूं किस की दौलत हूं

नज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए हसती
मैं वोह छोटी सी दुनिया हूं कि आप अपनी वलायात हूं

ना सहबा हूं ना साकी हूं ना मसती हूं ना पैमाना
मैं इस मैख़ाना-ए-हसती में हर शै की हकीकत हूं

मुझे राज़-ए-दो आलम दिल का आईना दिखाता है
वोही कहता हूं जो कुछ सामने आंखों के आता है

अता ऐसा बयां मुझ को हूआ रंगीं बियाबानों में
कि बाम-ए-अरश के तायर हैं मेरे हमज़ुबानों में

असर येह भी है एक मेरे जुनून-ए-फ़ितना समन का
मेरा आईना-ए-दिल है कज़ा के राज़दानों में

रुलाता है तेरा नज़ारा ऐ हिन्दुसतान मुझ को
कि इबरत ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों में

दीया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दीया गोया
लिखा कलक-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहाख़वानों में

निशान-ए-बरग-ए-गुल तक भी ना छोड़ इस बाग़ में गुलचीं
तेरी किसमत से रज़म अरायां हैं बाग़बानों में

छुपा कर आसतीं में बिजलियां रखी हैं गरदूं ने
अनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशीयानों में

सुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी, येह ऐसी चीज़ है जिस को
वज़ीफ़ा जान कर पड़्हते है तायर बोसतानों में

वतन की फ़िकर कर नादां मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबाद्यों के मशवरे हैं आसमानों में

ज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है, होने वाला है
धरा कया है भला अहद-ए-कुहन की दासतानों में

येह ख़ामोशी कहां तक ? लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा कर
ज़मीं पर तू हो और तेरी ददा हो आसमानों में

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दुसतां वालो
तुमहारी दासतां तक भी न होगी दासतानों में

यही आईन-ए-कुदरत है, यही उसलूब-ए-फ़ितरत है
जो है राह-ए-अमल में गामज़न, महबूब-ए-फ़ितरत है

है वायदा आज अपने ज़ख़म-ए-पिनहां कर के छोड़ूंगा
लहू रो रो के महफ़िल को गुलसितां कर के छोड़ूंगा

जलाना है मुझे हर शमा-ए-दिल को सोज़-ए-पिनहां से
तेरी तरीक रातों में चराग़ां कर के छोड़ूंगा

मगर गुंचों की सूरत हों दिल-ए-दरद आशना पैदा
चमन में मुशत-ए-ख़ाक अपनी परेशां कर के छोड़ूंगा

परोना एक ही तसबीह में इन बिखरे दानों को
जो मुशकिल है, तो इस मुशकिल को आसां कर के छोड़ूंगा

मुझे ऐ हमनशीं रहने दे शुग़ल-ए-सीना कावी में
कि मैं दाग़-ए-मुहब्बत को नुमायां कर के छोड़ूंगा

दिखा दूंगा जहां को जो मेरी आंखों ने देखा है
तुझे भी सूरत-ए-आईना हैरां कर के छोड़ूंगा

जो है परदों में पिनहां, चशम-ए-बीना देख लेती है
ज़माने की तबीयत का तकाज़ा देख लेती है

कीया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आशना तूने
गुज़ारी उमर पसती में मिसाल-ए-नकश-ए-पा तूने

रहा दिल बसता-ए-महफ़िल, मगर अपनी निगाहों को
कीया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत आशना तूने

फ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदायों पर
मगर देखी न इस आईने में अपनी अदा तूने

ताअसुब छोड़ नादां ! दहर के आईना ख़ाने में
तसवीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तूने

सरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िन्दगी हो जा
सपन्द आसा गिरह में बांध रखी है सदा तूने

सफ़ा-ए-दिल को कीया अरायश-ए-रंग-ए-तालुक से
कफ़-ए-आईना पर बांधी है ओ नादां ! हिना तूने

ज़मीं कया आसमां भी तेरी कज बीनी पे रोता है
ग़ज़ब है सतर-ए-कुरान को चालीपा कर दीया तूने !

ज़ुबां से गर कीया तौहीद का दावा तो कया हासिल !
बनाया है बुत्त-ए-पिन्दार को अपना ख़ुदा तूने

कुनवैन में तूने युसफ़ को जो देखा भी तो कया देखा
अरे ग़ाफ़िल ! जो मुतलिक था मुकय्यद कर दीया तूने

हवस बाला-ए-मनबर है तुझे रंगीं बयानी की
नसीहत भी तेरी सूरत है एक अफ़साना ख़वानी का

दिखा वोह हुस्न-ए-आलम सोज़ अपनी चशम-ए-पुरनम को
जो तड़पाता है परवाने को रुलाता है शबनम को

निरा नज़ारा ही ऐ बू-अल-होस मकसद नहीं इस का
बनाया है किसी ने कुछ समझ कर चशम-ए-आदम को

अगर देखा भी उस ने सरे आलम को तो कया देखा
नज़र आयी न कुछ अपनी हकीकत जाम से जम को

शज़र है फ़िरका आरायी ताअसुफ है समर इसका
ये वोह फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम को

न उठा जज़बा-ए-ख़ुरशीद से एक बरग-ए-गुल तक भी
ये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम को

फिरा करते नहीं मजरूह-ए-उलफ़त फ़िकर-ए-दरमां में
ये ज़ख़मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम को

मुहब्बत के शहर से दिल सरापा नूर होता है
ज़रा से बीज़ से पैदा रियाज़-ए-तूर होता है

दवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए आरज़ू रहना
इलाज-ए-ज़ख़म आज़ाद-ए-अहसां-ए-रफ़ू रहना

शराब-ए-बेख़ुदी से ता फ़लक परवाज़ है मेरी
शिकसत-ए-रंग से सीखा है मैंने बन के बू रहना

थामे कया दीदा’ए गिरीयां वतन की नौहा ख़वानी में
इबादत चशम-ए-शायर की है हर दम बा-वज़ू रहना

बनायें कया समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशीयां अपना
चमन में आह ! कया रहना जो हो बेआबरू रहना

जो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मुहब्बत में
ग़ुलामी है असीर-ए-इमतियाज़-ए-मा-ओ-तू रहना

ये असतागना है, पानी में निगूं रखता है साग़र को
तुझे भी चाहीये मिसल-ए-हबाब-ए-आबजू रहना

न रह अपनों से बेपरवाह इसी में ख़ैर है तेरी
अगर मंज़ूर है दुनिया में आओ बेगाना-खोर ! रहना

शराब-ए-रूह परवर है मुहब्बत नू-ए-इनसां की
सिखाया इस ने मुझ को मसत बेजाम-ओ-सबू रहना

मुहब्बत ही से पायी है शफ़ा बीमार कौमों ने
कीया है अपने बख़त-ए-ख़ुफ़ता को बेदार कौमों ने

बयाबां-ए-मुहब्बत दशत-ए-ग़ुरबत भी, वतन भी है
ये वीराना कफ़स भी, आशीयाना भी, चमन भी है

मुहब्बत ही वोह मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भी
जरस भी, कारवां भी, रहबर भी, रहज़न भी है

मरज़ कहते हैं सब इस को, ये है लेकिन मरज़ ऐसा
छुपा जिस में इलाज-ए-गरदिश-ए-चरख़-ए-कुहन भी है

जलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जाना
ये परवाना जो सोज़ां हो तो शमा-ए-अंजुमन भी है

वही एक हुस्न है, लेकिन नज़र आता है हर शैय में
ये शीरीं भी है गोया, बेसतूं भी, कोहकन भी है

उजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईन ने कौमों को
मेरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िकर-ए-वतन भी है ?

सकूत आमोज़ तूल-ए-दासतां-ए-दरद है वरना
ज़ुबां भी है हमारे मूंह में और ताब-ए-सुख़न भी है

“नामीगर दीद को थे रिशता’ए माअनी रहा करदम
हकायत-ए-बूद बे पायां, बाख़ामोशी अदा करदम”

शिकवा

कयूं ज़ियां कार बनूं सूद फ़रामोश रहूं ?
फ़िकर-ए-फ़रदा न करूं महव-ए-ग़म दोश रहूं
नाले बुलबुल के सुनूं और हमातन गोश रहूं
हमनवा ! मैं भी कोयी गुल हूं कि ख़ामोश रहूं
जुरअत आमूज़ मेरी ताब-ए-सुख़न, है मुझ को
शिकवा अल्लाह से ख़ाकुम-ब-दहन है मुझ को

है बजा शेवा-ए-तसलीम में मशहूर हैं हम
किस्सा-ए-दरद सुनाते हैं कि मज़बूर हैं हम
साज़ ख़ामोश हैं, फ़रयाद से मामूर हैं हम
नाला आता है अगर लब पे तो माज़ूर हैं हम
ऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अरबाब-ओ-वफ़ा भी सुन ले
ख़ुगर-ए-हमद से थोड़्हा सा गिला भी सुन ले

थी तो मौजूद अज़ल से ही तेरी ज़ात कदीम
फूल था ज़ेब-ए-चमन, पर न परेशां थी शमीम
शरत इनसाफ़ है ऐ साहब-ए-अलताफ़-ए-अमीम
बू-ए-गुल फैलती इस तरह जो होती न नसीम
हम को जमियत-ए-ख़ातिर यह परेशानी थी
वरना उम्मत तेरे महबूब की दीवानी थी

हम से पहले था अजब तेरे जहां का मंज़र
कहीं मसजूद थे पत्थर, कहीं माबूद शजर
ख़ूगर-ए-पैकर-ए महसूस थी इनसां की नज़र
मानता फिर कोयी अन-देखे ख़ुदा को कयूं कर
तुझ को मालूम है लेता था कोयी नाम तेरा ?
कुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुसलिम ने कीया काम तेरा

सख़तीयां करता हूं दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूं मैं

सख़तीयां करता हूं दिल पर, ग़ैर से ग़ाफ़िल हूं मैं
हाए ! कया अच्छी कही, ज़ालिम हूं मैं, जाहल हूं मैं

मैं जभी तक था कि तेरी जलवापैरायी न थी
जो नमूदे-हक से मिट जाता है वुह बातिल हूं मैं

इलम के दरीया से निकले ग़ोताज़न गौहर-ब-दसत
वाय महरूमी ! ख़ज़फ़-चीने-लबे-साहल हूं मैं

है मेरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील
जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं, वुह ग़ाफ़िल हूं मैं

बज़मे-हसती अपनी आरायश पे तू नाज़ां न हो
तू तो इक तसवीर है महफ़िल की और महफ़िल हूं मैं

ढूंढता फिरता हूं ऐ ‘इकबाल’ ! अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर, आप ही मंज़िल हूं मैं

फिर चिराग़-ए-लाला से रौशन हूए कोह-ओ-दमन

फिर चिराग़-ए-लाला से रौशन हूए कोह-ओ-दमन
मुझ को फिर नग़मों पे उकसाने लगा मुरग़-ए-चमन

फूल हैं सहरा में या परीयां कितार अन्दर कितार
उदे उदे, नीले नीले, पीले पीले पैरहन

बरग़-ए-गुल पर रख गयी शबनम का मोती बाद-ए-सुबह
और चमकाती है इस मोती को सूरज की किरन

हुस्न-ए-बेपरवा को अपनी बे-नकाबी के लीये
हों अगर शहरों से बन पयारे तो शहर अच्छे कि बन

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़िन्दगी
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन, अपना तो बन

मन की दुनिया ! मन की दुनिया सोज़-ओ-मसती जज़ब-ओ-शौक
तन की दुनिया ! तन की दुनिया सूद-ओ-सौदा मकर-ओ-फ़न

मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
तन की दौलत छायों है आता है धन जाता है धन

मन की दुनिया में न पाया मैनें अफ़रंग़ी का राज
मन की दुनिया में न देखे मैंने शेख़-ओ-बरहमन

पानी पानी कर गयी मुझ को कलन्दर की येह बात
तू झुका जब ग़ैर के आगे न तन तेरा न मन

 

निशां यही है ज़माने में ज़िन्दा कौमों का

निशां यही है ज़माने में ज़िन्दा कौमों का
कि सुबहो शाम बदलती हैं उनकी तकदीरें

कमाले सिदको मुरव्वत है ज़िन्दगी उनकी
मआफ़ करती है फ़ितरत भी उनकी तकसीरें

कलन्दराना अदाएं सिकन्दराना जलाल
यह उमतें हैं जहां में बरहना शमशीरें

ख़ुदी है मरदे ख़ुद आगाह का जमालो जलाल
कि यह किताब है, बाकी तमाम तफ़सीरें

शुकोहो ईद का मुनकिर नहीं हूं मैं लेकिन
कुबूले हक हैं फ़कत मरदे हुर की तकबीरें

हकीम मेरी नवायों का राज़ कया जाने
वराए अकल है अहलेजुनूं की तदबीरें

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