डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 7

डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 7

ज़िन्दगी

बरतर अज़-अन्देशा सूद-ओ-ज़ियां है ज़िन्दगी
है कभी जां और कभी तसलीम-ए-जां है ज़िन्दगी

तू उस पैमाना-ए-इमरोज़ वह फ़रदा से ना नाप
जाविदां, पैहम दवां, हर दम जवां है ज़िन्दगी

अपनी दुनियां आप पैदा कर अगर ज़िन्दों में है
सर आदम है ज़मीर कुन फुकां है ज़िन्दगी

ज़िन्दगानी की हकीकत कोहकन के दिल से पूछ
जू-ए-शेर वह तेशा व संग-ए-गिरां है ज़िन्दगी

बन्दगी में घट के रह जाती है इक जू-ए कम आब
और आज़ादी में बह-ए-बेकरां है ज़िन्दगी

आशकारा है यह अपनी कुव्वत-ए-तसफ़ीर से
गरचे इक मिट्टी के पैकर में नेहां है है ज़िन्दगी

कुलज़ुम-ए-हसती से तू उभरा है मानन्द-ए-हबाब
इस ज़ियां ख़ाने में तेरा इमतहां है ज़िन्दगी

येह पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुबहगाही

येह पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुबहगाही
कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मकाम बादशाही

तेरी ज़िन्दगी इसी से, तेरी आबरू इसी से
जो रही ख़ुदी तो शाही न रही तो रूस्याही

ना दीया निशान-ए-मंज़िल मुझे ऐ हकीम तूने
मुझे कया गिला हो तुझ से तू न रहनशीं न राही

मेरे हलका-ए-सुख़न में अभी ज़ेरे तरबियत हैं
वोह गदा कि जानते हैं रह-ओ-रसम-ए-कजकलाही

येह मआमले हैं नाज़ुक जो तेरी रज़ा हो तू कर
कि मुझे तो ख़ुश न आया येह तरीक-ए-ख़ानकाही

तू हुमा का है शिकारी अभी इबतदा है तेरी
नहीं मसलेहत से ख़ाली येह जहान-ए-मुरग़-ओ-माही

तू अरब हो या अजम हो तेरा लायलाहा इल्ला
लुग़त-ए-ग़रीब जब तक तेरा दिल न दे गवाही

वही मेरी कम नसीबी वही तेरी बेन्याज़ी

वही मेरी कम नसीबी वही तेरी बेन्याज़ी
मेरे काम कुछ न आया ये कमाल-ए-नै नवाज़ी

मैं कहां हूं तू कहां है, ये मकां कि ला-मकां है ?
ये जहां मेरा जहां है कि तेरी करिशमा साज़ी

इसी कशमकश में गुज़रीं मेरी ज़िन्दगी की रातें
कभी सोज़-ओ-साज़-ए-रूमी, कभी पेच-ओ-ताब-ए-राज़ी

वोह फ़रेब खुरदा शाहीं कि पला हो करगसों में
उसे कया ख़बर कि कया है रह-ओ-रसम-ए-शाहबाज़ी

न ज़ुबां कोयी ग़ज़ल की न ज़ुबां से बा-ख़बर मैं
कोयी दिल कुशा सदा हो अजमी हो या कि ताज़ी

नहीं फ़कर-ओ-सलतनत में कोयी इमत्याज़ ऐसा
ये सिपह की तेग़ बाज़ी वोह निगाह की तेग़ बाज़ी

कोयी कारवां से टूटा, कोयी बदग़ुमां हरम से
कि अमीर-ए-कारवां में नहीं खू-ए-दिल नवाज़ी

तेरे इशक की इंतहा चाहता हूं

तेरे इशक की इंतहा चाहता हूं
मेरी सादगी देख, कया चाहता हूं ?

सितम हो के हो वादा-ए-बेहजाबी
कोयी बात सबर-आज़मा चाहता हूं

येह जन्नत मुबारिक रहे ज़ाहदों को
कि मैं आपका सामना चाहता हूं

ज़रा-सा तो दिल हूं, मगर शोख़ इतना
वही ‘लनतरानी’ सुना चाहता हूं

कोयी दम का मेहमां हूं ऐ अहले-महफ़िल !
चराग़े-सहर हूं, बुझा चाहता हूं

भरी बज़म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बेअदब हूं, सज़ा चाहता हूं

सितारा-ए-सहर

लुतफ़ हमसायेगी शमस-ओ-कमर को छोड़ूं
और इस ख़िदमते पैग़ाम-ए-सहर को छोड़ूं

मेरे हक में तो नहीं तारों की बसती अच्छी
इस बुलन्दी से ज़मीं वालों की पसती अच्छी

आसमां कया, अदम आबाद वतन है मेरा
सुबह का दामन सद-ए-चाक कफ़न है मेरा

मेरी किसमत में हर रोज़ का मरना जीना
साकी मौत के हाथों से सबूही पीना

न ये ख़िदमत, न ये इज़्ज़त न ये रिफ़अत अच्छी
इस घड़ी भर के चमकने से तो ये ज़ुलमत अच्छी

मेरी कुदरत में जो होता न अख़तर बनता
कशतर-ए-दरीया में चमकता हुआ गौहर बनता

वां भी मौजों की कशाकश से जो दिल घबराता
छोड़ कर बहर कहीं ज़ेब गुलू हो जाता

ऐसी चीज़ों का मगर दहर में है काम शिकसत
है गुहर हाए गहरा नुमाया का अंज़ाम शिकसत

है ये अंज़ाम अगर ज़ीनत-ए-आलम हो कर
कयूं न गिर जाऊं किसी फूल पे शबनम हो कर

साकी

नशा पिला के गिराना तो सबको आता है
मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साकी

जो बादाकश थे पुराने वो उठते जाते हैं
कहीं से आबे-बकाए-दवाम ले साकी

कटी है रात तो हंगामा गुसतरी में तेरी
सहर करीब है अल्ल्हा का नाम ले साकी

समझा लहू की बून्द अगर तू इसे तो ख़ैर

समझा लहू की बून्द अगर तू इसे तो ख़ैर
दिल आदमी का है फ़कत एक जज़बाए बुलन्द

गरदिश माह-ओ-सितारा की है नागवार इसे
दिल आप अपने शाम-ओ-सहर का है नकश बन्द

जिस ख़ाक के ज़मीर में है आतिश-ए-चिनार
मुमकिन नहीं कि सरद हो वोह ख़ाक-ए-अरजूमन्द

परीशां हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाये

परीशां हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाये
जो मुशकिल अब है या रब फिर वही मुशकिल न बन जाये

न कर दें मुझ को मजबूर-ए-नवा फ़िरदौस में हूरें
मेरा सोज़-ए-दरूं फिर गरमी-ए-महफ़िल न बन जाये

कभी छोड़ी हुयी मंज़िल भी याद आती है राही को
खटक सी है, जो सीने में, ग़म-ए-मंज़िल न बन जाये

बनाया इशक ने दरीया’ए न पायदा करां मुझ को
ये मेरी ख़ुद निगहदारी मेरा साहल न बन जाये

कहीं इस आलम-ए-बे-रंग-ओ-बू में भी तलब मेरी
वही अफ़साना’ए दम्बाला’ए महमिल न बन जाये

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा माह-ए-कामिल न बन जाये

ऐ वादी-ए-लोलाब

पानी तेरे चशमों का तड़पता हूआ सीमाब
मुरग़ान-ए-सहर तेरी फ़िज़ायों में हैं बेताब
ऐ वादी-ए-लोलाब

गर साहब-ए-हंगामा न हों मनबर-ओ-महराब
दीन बन्दा-ए-मोमिन के लीये मौत है या ख़वाब
ऐ वादी-ए-लोलाब

हैं साज़ पे मौकूफ़ नावा हाअए जियां सोज़
ढीली हों अगर तार तो बेकार है मिज़राब
ऐ वादी-ए-लोलाब

मुल्ला की नज़र नूर-ए-फ़िरसत से है खाली
बेसोज़ है मैख़ाना-ए-सूफ़ी की मै-ए-नाब
ऐ वादी-ए-लोलाब

बेदार हों दिल जिस की फ़ुग़ां-ए-सहरी से
इस कौम में मुद्दत से वोह दरवेश है नायाब
ऐ वादी-ए-लोलाब

नै मुहरह बाकी, नै मुहरह बाज़ी

नै मुहरह बाकी, नै मुहरह बाज़ी
जीता है रूमी हारा है राज़ी

रौशन है जाम-ए-जमशेद अब तक
शाही नहीं है बे शीशा बाज़ी

दिल है मुसलमां मेरा न तेरा
तू भी नमाज़ी मैं भी नमाज़ी

मैं जानता हूं अंजाम उसका
जिस मारके में मुल्ला हो ग़ाज़ी

तुरकी भी शीरीं ताज़ी भी शीरीं
हरफ़-ए-मुहब्बत तुरकी न ताज़ी

आज़र का पेशा खारा तराशी
कार-ए-ख़लीलां खारा गुदाज़ी

तू ज़िन्दगी है पायन्दगी है
बाकी है जो कुछ सब ख़ाक बाज़ी

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