डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 4

डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 4

अख़तर-ए-सुबह

सितारा सुबह का रोता था और ये कहता था
मिली निगाह, मगर फुरसत-ए-नज़र न मिली

हूयी है ज़िन्दा दमे-आफ़ताब से हर शैअ
अमां मुझी को तहे दामन-ए-सहर न मिली

बिसात कया है भला सुबह के सितारे की
नफ़स हबाब का ताबिन्दग़ी शरारे की

कहा ये मैंने कि ऐ ज़ेवर-ए-जबीन-ए-सहर
ग़म फ़ना है तुझे, गुम्बद-ए-फ़लक से उतर

टपक बुलन्दी गरदूं से हमरहे शबनम
मेरे र्याज़-ए-सुख़न की फ़िज़ा है जां परवर

मैं बाग़बां हूं, मुहब्बत बहार है इस की
बिना मिसाले-अबद पाएदार है इस की

असरार-ए-पैदा

उस कौम को शमशीर की हाजत नहीं रहती
हो जिस के जवानों की खुदी सूरते फ़ौलाद

नाचीज़ जहाने महो परवीं तेरे आगे
वह आलमे मजबूर है तू आलमे आज़ाद

मौजों की तपिश कया है फ़कत ज़ौके तलब है
पिनहां जो सदफ़ में है वह दौलत है खुदादाद

शाहीं कभी परवाज़ से थक कर नहीं गिरता
पुर दम है अगर तू तो नहीं ख़तरा-ए-उफ़ताद

 चांद और तारे

डरते ड्रते दम-ए-सहर से
तारे कहने लगे कमर से

नज़ारे रहे वही फ़लक पर
हम थक भी गए चमक चमक कर

काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना
चलना चलना, मदाम चलना

बेताब है इस जहां की हर शैअ
कहते हैं जिसे सुकूं नहीं है

रहते हैं सितम कशे सफ़र सब
तारे, इनसां, शजर, हजर सब

होगा कभी ख़तम ये सफ़र कया
मंज़िल कभी आएगी नज़र कया

कहने लगा चांद ऐ-हमनशीनों
ऐ-मजरा-ए-शब के ख़ोशाचीनों

जुम्बिश से है ज़िन्दगी यहां की
ये रसम कदीम है यहां की

है दौड़ता अशहबे ज़माना
खा खा के तलब का ताज़ियाना

इस रह में मकाम बे-महल है
पोशीदा करार में अज़ल है

चलने वाले निकल गए हैं
जो ठहरे ज़रा कुचल गए हैं

अंजाम है इस ख़िराम का हुस्न
आग़ाज़ है इशक, इनतेहा हुस्न

दिल सोज़ से खाली है, निगह पाक नहीं है

दिल सोज़ से खाली है, निगह पाक नहीं है
फिर इसमें अजब कया कि तू बेबाक नहीं है

है ज़ौक-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिनहां
ग़ाफ़िल ! तू निरा साहब-ए-अदराक नहीं है

वोह आंख कि है सुरमा-ए-अफ़रंग से रौशन
पुरकार-ओ-सुख़नसाज़ है, नमनाक नहीं है

कया सूफ़ी व मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूं की
उनका सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है

कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मेरी ख़ाक
या मैं नहीं या गरदिश-ए-अफ़लाक नहीं है

बिजली हूं नज़र कोह-ए-बयाबां पे है मेरी
मेरे लीये शायां-ए-ख़श-ओ-ख़शाक नहीं है

आलम है फ़कत मोमिन-ए-जांबाज़ की मीरास
मोमिन नहीं जो साहब-ए-लौलाक नहीं है

एक दानिशे नूरानी, एक दानिशे बुरहानी

एक दानिशे नूरानी, एक दानिशे बुरहानी
है दानिशे बुरहानी हैरत की फ़रावानी

इस पैकर-ए-ख़ाकी में एक शैय है, सो वो तेरी
मेरे लीये मुशकिल है इस शैय की निगहबानी

अब कया जो फ़ुग़ां मेरी पहुंची है सितारों तक
तूने ही सिखायी थी मुझ को ये ग़ज़ल ख़वानी

हो नकश अगर बातिल तकरार से कया हासिल
कया तुझ को ख़ुश आती है आदम की ये अरज़ानी ?

मुझ को तो सिखा दी है अफ़रंग ने ज़नदीकी
इस दौर के मुल्लां हैं कयों नंग-ए-मुसलमानी !

तकदीर शिकन कुव्वत बाकी है अभी इसमें
नादां जिसे कहते है तकदीर का ज़िन्दानी

तेरे भी सनम ख़ाने, मेरे भी सनम ख़ाने
दोनों की सनम ख़ाकी, दोनों की सनम फ़ानी

गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर

गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर
होश-ओ-ख़िरद शिकार कर, कलब-ओ-नज़र शिकार कर

इशक भी हो हिजाब में, हुस्न भी हो हिजाब में
या तो ख़ुद आशकार हो या मुझे आशकार कर

तू है मुहीत-ए-बेकरां, मैं हूं ज़रा सी आबजू
या मुझे हमकिनार कर, या मुझे बेकिनार कर

मैं हूं सदफ़ तो तेरे हाथ मेरे गुहर की आबरू
मैं हूं ख़ज़फ़ तो तू मुझे गौहर-ए-शाहसवार कर

बाग़-ए-बहशत से मुझे हुकम-ए-सफ़र दीया था कयूं
कार-ए-जहां दराज़ है अब मेरा इंतज़ार कर

रोज़-ए-हसाब जब मेरा पेश हो दफ़तर-ए-अमल
आप भी शरमशार हो, मुझ को भी शरमशार कर

हकीकत-ए-हुस्न

ख़ुदा से हुस्न ने इक रोज़ ये सवाल कीया
जहां में कयूं न मुझे तूने ला-ज़वाल कीया

मिला जवाब कि तसवीरख़ाना है दुनिया
शब-ए-दराज़ अदम का फ़साना है दुनिया

हुयी है रंगे-तग़य्युर से जब नुमूद इसकी
वही हसीन है हकीकत ज़वाल है जिसकी

कहीं करीब था, ये गुफ़तगू कमर ने सुनी
फ़लक पे आम हुई, अख़तर-ए-सहर ने सुनी

सहर ने तारे से सुनकर सुनायी शबनम को
फ़लक की बात बता दी ज़मीं के महरम को

भर आये फूल के आंसू पयामे-शबनम से
कली का नन्न्हा सा दिल ख़ून हो गया ग़म से

चमन से रोता हुआ मौसमे-बहार गया
शबाब सैर को आया था सोग़वार गया

 इनसान

मंज़र चमनिसतां के ज़ेबा हों कि नाज़ेबा
महरूम-ए-अमल नरगिस, मज़बूरे-तमाशा है

रफ़तार की लज़्ज़त का अहसास नहीं इस को
फ़ितरत ही सनोबर की महरूमे-तमन्ना है

तसलीम की ख़ूगर है जो चीज़ है दुनिया में
इनसान की हर कुव्वत सरगरमे-तकाज़ा है

इस ज़र्रे को रहती है वुसअत की हवस हर दम
ये ज़र्रा नहीं शायद सिमटा हुआ सहरा है

चाहे तो बदल डाले हैअत चमनिसतां की
ये हसती-ए-दाना है, बीना है, तवाना है

 जावेद इकबाल के नाम

दयार-ए-इशक में अपना मुकाम पैदा कर
नया ज़माना नये सुबह-ओ-शाम पैदा कर

ख़ुदा अगर दिले-फ़ितरत-शनास दे तुझ को
सुकूते-लाल-ओ-गुल से कलाम पैदा कर

उठा न शीशा-गराने-फ़िरंग के अहसां
सिफ़ाले-हन्द से मीना-ओ-जाम पैदा कर

मैं शाख़े-ताक हूं मेरी ग़ज़ल है मेरा समर
मेरे समर से मय-ए-लालाफ़ाम पैदा कर

मेरा तरीक अमीरी नहीं फ़कीरी है
ख़ुदी न बेच, ग़रीबी में नाम पैदा कर

 कभी ऐ हकीकत मुंतज़िर नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

कभी ऐ हकीकत-ए-मुंतज़िर नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सिजदे तड़प रहे मेरी जबीं-ए-नियाज़ में

तरब आशनाय-ए-ख़रोश हो तो नवा है महरम-ए-गोश में
वो सरोद कया के छुपा हूआ हो सुकूत परदा-ए-साज़ में

तू बचा बचा के न रख उसे, तेरा आईना है वो आईना
के शिकसता हो तो अज़ीज़ तर है निगाह आईना साज़ में

दम तौफ़ किरमक शमा ने यह कहा कि वोह असर कुहन है
न तेरी हिकायत-ए-सोज़ में, न मेरी हदीस-ए-गुदाज़ में

न कहीं जहां में अमां मिली, जो अमां मिली तो कहां मिली
मेरे ज़ुरम-ए-ख़ाना ख़राब को तेरे अफ़ब-ओ-बन्दा नवाज़ में

न वो इशक में रहीं गरमीयां, न वो हुस्न में रहीं शोखियां
न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुलफ़-ए-अयाज़ में

जो मैं सर ब-सिजदा हूआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम-आशना, तुझे कया मिलेगा नमाज़ में

Leave a Reply