डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 2

डॉक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr Allama Muhammad Iqbal Poetry/shayari Part 2

अगर कज रौ हैं अंजुम, आसमां तेरा है या मेरा

अगर कज रौ हैं अंजुम, आसमां तेरा है या मेरा ?
मुझे फ़िकर-ए-जहां कयों हो, जहां तेरा है या मेरा ?

अगर हंगामा हा’ए शौक से है ला-मकां खाली
खता किस की है या रब ! ला-मकां तेरा है या मेरा ?

उसे सुबह-ए-अज़ल इनकार की जुरअत हुयी कयों कर
मुझे मालूम कया, वो राज़दां तेरा है या मेरा ?

मुहंमद भी तेरा, जिबरील भी, कुरआन भी तेरा
मगर ये हरफ़-ए-शरीं तरजुमान तेरा है या मेरा ?

इसी कोकब की ताबानी से है तेरा जहां रौशन
ज़वाल-ए-आदम-ए-ख़ाकी ज़यां तेरा है या मेरा ?

अकल-ओ-दिल

अकल ने एक दिन ये दिल से कहा
भूले-भटके की रहनुमा हूं मैं

तू ज़मीं पर, गुज़र फ़लक है मेरा
देख तो किस कदर रसा हूं मैं

काम दुनिया में रहबरी मेरा
मिसल ख़िज़र ख़सता पा हूं मैं

हूं मुफ़सिर किताबे-हसती की
मज़हर-ए-शान किबरीया हूं मैं

दिल ने सुनकर कहा ये सब सच है
पर मुझे भी तो देख कया हूं मैं

राज़े-हसती को तू समझती है
और आंखों से देखता हूं मैं

है तुझे वासता मज़ाहर से
और बातिन से आशना हूं मैं

इलम तुझसे तो मारिफ़त मुझसे
तू ख़ुदा जू ख़ुदा-नुमा हूं मैं

इलम की इनतेहा है बेताबी
इस मरज़ की मगर दवा हूं मैं

शम्हा तू महफ़िल-ए-सदाकत की
हुस्न की बज़म का दीया हूं मैं

तू ज़मान-ओ-मकां से रिशता बपा
तायरा-ए-सिदरा आशना हूं मैं

किस बुलन्दी पे है मकाम मेरा
अरश रब-ए-जलील का हूं मैं

आज़ाद की रग सख़त है मानिन्द रग-ए-संग

आज़ाद की रग सख़त है मानिन्द रग-ए-संग
महकूम की रग नरम है मानिन्द-ए-रग-ए-ताक

महकूम का दिल मुरदा-ओ-अफ़सुरदा-ओ-नाउमीद
आज़ाद का दिल ज़िन्दा-ओ-पुरसोज़-ओ-तरबनाक

आज़ाद की दौलत-ए-दिल रौशन, नफ़स-ए-गिराम
महकूम का सरमाया फ़कत दीदाए नमनाक

महकूम है बेगाना-ए-इख़लास-ओ-मुरव्वत
हर चन्द कि मनताक की दलीलों में है चालाक

मुमकिन नहीं महकूम हो आज़ाद का हमदोश
वोह बन्दा-ए-अफ़लाक है, येह ख़वाजा-ए-अफ़लाक

 दिगरगूं है, जहां, तारों की गरदिश तेज़ है साकी

दिगरगूं है, जहां, तारों की गरदिश तेज़ है साकी
दिल हर ज़र्रा में ग़ोग़ाए रसताख़ेज़ है साकी

मता-ए-दीं-ओ-दानिश लुट गयी अल्ल्हा वालों की
येह किस अदा का ग़मज़दाए ख़ूंरेज़ है साकी

वही देरीना बीमारी वही न-महकामी दिल की
इलाज इस का वही आब-ए-निशात अंग़ेज़ है साकी

हरम के दिल में सोज़-ए-आरज़ू पैदा नहीं होता
कि पायेदारी तेरी अब तक हिजाब आमेज़ है साकी

न उठा फिर कोयी रूमी अजम के लाला-ज़ारों से
वही आब-ओ-गिल्ल इरान, वही तबरेज़ है साकी

नहीं है न-उमीद इकबाल अपनी किशत-ए-वीरां से
ज़रा नम हो तो येह मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साकी

फ़कीर-ए-राह को बख़शे गए असरार-ए-सुलतानी
बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साकी

फ़रिशते आदम को जन्नत से रुख़सत करते हैं

अता हूयी है तुझे रोज़-ओ-शब की बेताबी
ख़बर नहीं तू ख़ाकी है याकि सीमाबी

सुना है ख़ाक से तेरी नुमूद है लेकिन
तेरी सिरिशत में है कोकबी-ओ-महताबी

जमाल अपना अगर ख़ाब में भी तू देखे
हज़ारों होश से ख़ुशतर तेरी शकर ख़वाबी

गिरां बहा है तेरा गिरया-ए-सहर गाही
उसी से है तेरे नख़ले-कुहन की शादाबी

तेरी नवा से है बे परदा ज़िन्दगी का ज़मीर
कि तेरे साज़ की फ़ितरत ने की है मिज़राबी

फ़रमान-ए-ख़ुदा (फ़रिशतों से)

उठो मेरी दुनियां के ग़रीबों को जगा दो
काख़े उमरा के दरो दीवार हिला दो

गरमायो गुलामों का लहू सोज़े यकीं से
कंजशक फ़रो माया को शाहीं से लड़ा दो

सुलतानी-ए-जुमहूर का अता है ज़माना
जो नकशे कोहन तुम को नज़र आए मिटा दो

जिस खेत से दहकां को मयस्सर न हो रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गन्दुम को जला दो

कयूं ख़ालिको मख़लूक में हायल रहें परदे
पीराने कलीसा को कलीसा से उठा दो

मैं नाखुशो बेज़ार हूं मरमर की सिलों से
मेरे लीए मिट्टी का हरम और बना दो

गुलामी में काम आती शमशीरें न तदबीरें

गुलामी में काम आती शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौक-ए-यकीं पैदा तो कट जाती हैं जंज़ीरें

कोयी अन्दाज़ा कर सकता है उस के ज़ोरे बाज़ू का
निगाह मरद-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तकदीरें

विलायत, पादशाही, इलम, अशया की जहांगीरी
यह सब कया हैं फ़कत इक नुकता-ए-इमां की तफ़सीरें

बराहीमी नज़र पैदा मगर बड़ी मुशकिल से होती है
हवस छुप छुप के सीने में बना लेती है तसवीरें

तमीज़ बन्द-ओ-आका, फ़साद आदमीयत है
हज़र ए चीरा-ए-दासतां सख़त हैं फ़ितरत की ताज़ीरें

हकीकत एक है हर शै की ख़ाकी हो के नूरी हो
लहू खुरशीद का टपके, अगर ज़र्रे का दिल चीरें

यकीं मुहकम, अमल पैहम, मोहब्बत फ़ातहे आलम
जेहाद-ए-ज़िन्दगानी में यह मरदों की शमशीरें

गुलज़ारे-हसतो-बूद न बेगानावार देख

गुलज़ारे-हसतो-बूद न बेगानावार देख
है देखने की चीज़ इसे बार बार देख

आया है तू जहां में मिसाले-शरार, देख
दम दे न जाए हसती-ए-नापाएदार, देख

माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं
तू मेरा शौक देख, मेरा इंतिज़ार देख

खोली हैं ज़ौके-दीद ने आंखें तेरी अगर
हर रह गुज़र में नकशे-कफ़े-पाए-यार देख

 

 हमदरदी-विलियम कूपर

टहनी पे किसी शजर की तनहा
बुलबुल था कोयी उदास बैठा

कहता था कि रात सर पे आयी
उड़ने चुगने में दिन गुज़रा

पहुंचूं किस तरह आशीयां तक
हर चीज़ पे छा गया अंधेरा

सुन कर बुलबुल की आह-ओ-ज़ारी
जुगनू कोयी पास ही से बोला

हाज़िर हूं मदद को जां-ओ-दिल से
कीड़ा हूं अगरचे मैं ज़रा सा

कया ग़म है जो रात है अंधेरी
मैं राह में रौशनी करूंगा

अल्ल्हा ने दी है मुझ को मिशाल
चमका के मुझे दीया बनाया

हैं लोग वोही जहां में अच्छे
आते हैं जो काम दूसरों के

 

हर शैय मुसाफ़िर, हर चीज़ राही

हर शैय मुसाफ़िर, हर चीज़ राही
कया चांद तारे, कया मुरग-ओ-माही

तू मरद-ए-मैदां, तू मीर-ए-लशकर
नूरी हुज़ूरी तेरे सिपाही

कुछ कदर अपनी तूने न जानी
ये बेसवादी ये कम निगाई

दुनिया-ए-दूं की कब तक ग़ुलामी
ये राहबी कार या पादशाही

पीर-ए-हरम को देखा है मैंने
किरदार बे-सोज़, गुफ़तार वाही

 

इकबाल यहां नाम न ले इलमे खुदी का

इकबाल यहां नाम न ले इलमे खुदी का
मौजूं नही मकतब के लीए ऐसे मकालात

बेहतर है कि बेचारे ममूलों की नज़र से
पोशीदा रहें बाज़ के अहवालो मकामात

आज़ाद की एक आन है महकूम का एक साल
किस दरजा गिरां सैर हैं महकूम के अवकात

आज़ाद का हर लहज़ा पयामे अबदियत
महकूम का हर लहज़ा नई मरगेमुफ़ाज़ात

आज़ाद का अन्देशा हकीकत से मुनव्वर
महकूम का अन्देशा गिरफ़तारे ख़ुराफ़ात

महकूम को पीरों की करामात का सौदा
है बन्दा-ए-आज़ाद ख़ुद एक ज़िन्दा करामात

महकूम के हक में है यही तरबीयत अच्छी
मौसीकी वह सूरत गरी वह इलमेनबातात

जज़बा-ए-दरूं

येह कायनात छुपाती नहीं ज़मीर अपना
कि ज़र्रे-ज़र्रे में है ज़ोक आशकाराई

कुछ और ही नज़र आता है कारोबार जहां
निगाह-ए-शौक हो अगर शरीके बीनाई

इसी निगाह से महकूम कौम के फ़रज़न्द
हूए जहां में सज़ावार कार-ए-फ़रमाई

इसी निगाह में है काहरी वह जबारी
इसी निगाह में है दिलबरी वह रानाई

इसी निगाह से हर ज़र्रे को जुनूं मेरा
सिखा रहा है रह-ओ-रसम दसत-ए-पैमाई

निगाह-ए-शौक मयस्सर अगर नहीं तुझ को
तेरा वज़ूद है कलब-यो- नज़र की रुसवाई

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