डरे न कुछ भी जहां की चला चली से हम-शहीद भगत सिंह-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem|Kavita Shaheed Bhagat Singh 

डरे न कुछ भी जहां की चला चली से हम-शहीद भगत सिंह-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem|Kavita Shaheed Bhagat Singh

डरे न कुछ भी जहां की चला चली से हम।
गिरा के भागे न बम भी असेंबली से हम।

उड़ाए फिरता था हमको खयाले-मुस्तकबिल,
कि बैठ सकते न थे दिल की बेकली से हम।

हम इंकलाब की कुरबानगह पे चढ़ते हैं,
कि प्यार करते हैं ऐसे महाबली से हम।

जो जी में आए तेरे, शौक से सुनाए जा,
कि तैश खाते नहीं हैं कटी-जली से हम।

न हो तू चीं-ब-जबीं, तिवरियों पे डाल न बल,
चले-चले ओ सितमगर, तेरी गली से हम।

-अज्ञात
१५ जून १९२९, बन्दे मात्रिम (उर्दू पत्र)-लाहौर

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