ठूंठ और तृण-अलका सोनी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Alka Soni,

ठूंठ और तृण-अलका सोनी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Alka Soni,

पत्रहीन एक ठूंठ के पास
छरहरा सा
एक नन्हा तृण
उग आया कहीं से
हरा भरा, धानी रंग
रूप, यौवन, कोमलता से
भरा हुआ

इठलाता ,बलखाता
वो बढ़ने लगा,
तेज़ धूप और घनी
बरसात में भी
हंसता रहा

एक सुबह आँखें मींचते
उसने देखा कि
उसके और सूरज के बीच
ओट सा है कोई खड़ा
तृण को जलने से
बचाने की ज़िद पर अड़ा

आँख खुलने पर उसने
वहाँ एक ठूंठ को पाया
जैसे किसी बुजुर्ग का
हो वह सरमाया
नन्हें से तृण को
उस ठूंठ ने सहलाया
आंख भर आयी उसकी

जैसे गोद में वो
तृण बालक बन आया
बरसों के एकांत के बाद
कोई उससे मिलने आया
मित्रता हो गई
उस तृण की, ठूंठ से
ठूंठ की नीरसता
दूर हुई और
जीवन फिर मुस्कुराया।

 

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