ठाठ है फ़क़ीरी अपना-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

ठाठ है फ़क़ीरी अपना-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

गली-गली सपने बेचें, बाँटें सितारे
करें ख़ाली हाथ सौदा, साँझ-सकारे
ठाठ है फ़क़ीरी अपना जनम-जनम से।।

कोई नहीं मंज़िल अपनी
कोई ना ठिकाना
प्यार-भरी आँखों में है
अपना आशियाना
धरम-करम कोई नहीं
हमें बाँध पाये
अपने गाँव में भी रहे
बनके हम पराये
बन्धनों से नहीं, हम तो बंधते क़सम से
ठाठ है फ़क़ीरी अपना जनम-जनम से।।

वेद न कुरान बाँचे
ली न ज्ञान दीक्षा
सीखी नहीं भाषा कोई
दी नहीं परीक्षा,
दर्द रहा शिक्षक अपना
दुनिया पाठशाला
दुखों की किताब जिसमें
आँसू वर्ण-माला
लिखना तुम कहानी मेरी दिल की क़लम से
ठाठ है फ़क़ीरी अपना जनम-जनम से।।

हर तरह के फूल हमने
माला में पिरोये
ख़ुद को देखा हँसी आई
जग को देखा रोये
अमृत-ज़हर जो भी मिला
सबसे भरा प्याला
दिल जला के हमने किया
दुनिया में उजाला।
फूल हम खिलाते चले क़दम-क़दम से
ठाठ है फ़क़ीरी अपना जनम-जनम से।।

काम रहा अपना यारो!
सिर्फ़ दिल चुराना,
रोज़-रोज़ जाके आँखें
मौत से मिलाना
मस्तियों के नाम लिख दी
सारी ज़िन्दगानी,
हमसे ही है क़ायम अब तक
गीतों की जवानी।
मौत से न मरते हम तो मरते शरम से।
ठाठ है फ़क़ीरी अपना जनम-जनम से।।

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