टूटी जहां-जहां पे कमन्द-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

टूटी जहां-जहां पे कमन्द-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

रहा न कुछ भी ज़माने में जब नज़र को पसन्द
तिरी नज़र से किया रिशता-ए-नज़र पैवन्द

तिरे जमाल से हर सुबह पर वज़ू लाज़िम
हरेक शब तेरे दर पर सुजूद की पाबन्द

नहीं रहा हरमे-दिल में इक सनम बातिल
तिरे ख़्याल के लातो-मनात की सौगन्द

मिसाले-ज़ीना-ए-मंज़िल बकारे-शौक आया
हर इक मकाम कि टूटी जहां-जहां पे कमन्द

ख़िज़ां तमाम हुई किस हिसाब में लिखीए
बहारे-गुल में जो पहुंचे हैं शाख़े-गुल को गज़न्द

दरीदा दिल है शहर में कोई हमारी तरह
कोई दरीदा दहन शैख़े-शहर के मानन्द

शुआर की जो मुदाराते-कामते-जानां
किया है ‘फ़ैज़’ दरे-दिल, दरे-फ़लक से बुलन्द

Leave a Reply