टूटता सरि का किनारा!-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

टूटता सरि का किनारा!-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

टूटता सरि का किनारा!

सुमन-सौरभ, बेल-पल्लव,
कुसुम-कलियाँ, मधुप-मद्यप-
सरित-सुषमा का सुखद मिट रहा देखो खेल सारा!
टूटता सरि का किनारा!

प्राण-मधु-सौरभ बिछाकर,
ताप था जिसका लिया हर,
वही झंझा आज कुसुमों पर चलाती है कुठारा!
टूटता सरि का किनारा!

जड़-तरणि के डूबने पर,
ले सका था साँस क्षण-मर,
दूब तट पर की पकड़ कर-
एक नाविक, किन्तु देखो मिट रहा वह भी सहारा!
टूटता सरि का किनारा!

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