टुकड़े टुकड़े पहरों में- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

टुकड़े टुकड़े पहरों में- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

कलम उठा कर हाथों में श्रृंगार नहीं लिख पाता हूँ
चूड़ी कंगन पायल की झंकार नहीं लिख पाता हूँ
नदिया चाँद सितारों पर अब गीत नहीं लिख पाता हूँ
कल कल करते झरनों का संगीत नहीं लिख पाता हूँ
बाग बगीचे चिड़िया चुरगुन ये सब कुछ तो भूल गए
सावन भादो कातिक फागुन ये सब कुछ तो भूल गए
नरिया खपड़ा लीपा आँगन ये सब कुछ तो भूल गए
पोखर में अठखेली करता अपना बचपन भूल गए
रोजी रोटी की ख़ातिर हम आ निकले जब शहरों में
अपने वक्त को बाँट दिया तब टुकड़े टुकड़े पहरों में
खुली हवा में सोना भूले बाध की खटिया भूल गई
अब गद्दों पर सोते हैं हम अपने अपने पिंजरों में
हमने बचपन खेल गुजारा खो खो और कबड्डी में
तब जाकर के ताकत पाई अपनी नाजुक हड्डी में
आज का बचपन देखो कैसे कम्प्यूटर से खेल रहा
उसका क्रीड़ाक्षेत्र बना है अब सोफों की गद्दी में
अपने छुटपन की बातें जब बच्चों को बतलाता हूँ
उनकी नन्ही आँखों में बस विस्मय ही तो पाता हूँ
अमराई कैसे दिखलाऊँ नन्हें नन्हें कौतुक को
खेतों बीच नहर का मैं विस्तार नहीं लिख पाता हूँ
कलम उठा कर हाथों में श्रृंगार नहीं लिख पाता हूँ
चूड़ी कंगन पायल की झंकार नहीं लिख पाता हूँ

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