झोपड़ी महल को देती चुनौती-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

झोपड़ी महल को देती चुनौती-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

मॉल के बिल्कुल बगल में
चाय की गुमटी निराली।
महल को देती चुनौती
झोपड़ी अब तक न हारी।

आधुनिक तनया-तनय सब
चिप्स, बर्गर खा रहे हैैं।
हो रही है बोझ काया
हाँफते से जा रहे हैं।
फटी-चिथड़ी जींस पहने
रूप से अभिनव भिखारी।

महल को देती चुनौती
झोपड़ी अब तक न हारी।

निम्न-मध्यम वर्ग वाले
जा रहे पिकनिक समझ कर।
हँस रहे वातानुकूलित
भवन का आनंद लेकर।
चाय की चुस्कियाँ लेनें
आ रही है भीड़ सारी।

महल को देती चुनौती
झोपड़ी अब तक न हारी।

पुराना पतलून पहने
चाय रामू दे रहा है।
देख कर नव-वस्त्र चिथड़े
मजे वह भी ले रहा है।
सोचता मन मुदित होकर
पैंट अच्छी है हमारी।

महल को देती चुनौती
झोपड़ी, अब तक न हारी।

तेल की चिंता न उसको
मूल्य यदि आकाश छू ले।
पाँव में है शक्ति अद्भुत
मन पवन के साथ झूले।
कार एसी को चिढ़ाती
साइकिल की है सवारी।

महल को देती चुनौती
झोपड़ी अब तक न हारी।

सभ्यता के भोग नद में
रुग्ण हो सब गिर रहे हैं।
क्रुद्ध होकर काम-आतुर
मोह, मद से घिर रहे हैं।
नव्यतम विज्ञान की ये
खड्ग लगती है दुधारी।

महल को देती चुनौती
झोपड़ी अब तक न हारी।

संस्कृति का सार अक्षुण्ण
भारती के भक्त कर लें।
मन, वचन, सत्कर्म से सब
साधना कर सुखद वरलें।
सरस सलिला हो प्रवाहित
सनातन सरिता हमारी।

महल को देती चुनौती
झोपड़ी अब तक न हारी ।।

 

Leave a Reply