झुकी गर्दन-कर्मजीत सिंह गठवाला -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Karamjit Singh Gathwala

झुकी गर्दन-कर्मजीत सिंह गठवाला -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Karamjit Singh Gathwala

कई दिन से सोच रहा हूं,
उस दिन की बात;
वहम है या सत्य ?

मुझे मान्यवर कवि के
जन्म-दिन पर रखे
समागम का बुलावा आया ।
मैं बड़े चाव से वहां गया ।
वहां कवि की बड़ी सुन्दर
पर निर्जीव प्रतिमा
हंस रही थी ।
मुझे माला दी गई और
मैं उसे लेकर उस के पास पहुंचा;
मैंने यूं ही माला उपर उठाई,
वह बोली,
‘क्या आपने कभी भी
मेरी कोई कविता या
और रचना पूरी पढ़ी है ?’
मैंने हां में सिर हिलाया ।
वह हंसी फिर बोली,
‘क्या आपने कभी ये सोचा
कि उसमें क्या लिखा है ?’
मैंने फिर हां में सिर हिलाया
प्रतिमा फिर मुस्कुराई,
‘क्या आपने कभी उसमें से
किसी विचार को अपनाया है ?’
मैंने सिर नहीं हिलाया
बस उसे नीचा कर लिया ।

पीछे से आवाज आई
‘सोच क्या रहे हैं ?
माला गले में डाल दीजिये,
जलदी कीजीए,
प्रतिमा को नहीं;
हमें बहुत ठंड लग रही है।’

मैंने कुछ नहीं सोचा
माला गले में डाल दी
और झुकी गर्दन लिये
वापिस आ गया ।
जो अभी तक झुकी है।

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