झांसी चण्डी हो तुम बाला-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

झांसी चण्डी हो तुम बाला-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

 

सिसक सिसक कर रोने से
घुट घुट तड़पोगी तुम बाला।।
उठो चलो तलवार उठाओ,
झांसी चण्डी हो तुम बाला।

रौद्र रूप काली हो,
जो देखें राक्षस डर जाए।
एक बार जो ताड़व कर दो,
नीच निराधम मर जाएं।

इतनी शक्ति सबल होकर,
ऐसे न बैठो तुम बाला।

जौहर करने की रात गई,
अमरता की वो बात गई।
तुम कित्तूर की रानी चेन्नम्मा,
अब संविधान से आस गई।

भीकाजी कामा सी जैसी,
उठकर गरजो तुम बाला।।

रोज कहीं प्रताड़ित होती,
कहीं जली सी नारी होती।
राक्षसो में पड़ जाती,
कहीं मरी सी नारी होती।।

अरूणा आसफ सी उठ करके
क्रांति जगा दो तुम बाला।।

राक्षस अत्याचारी भी,
ये नीच कर्म न करते थे।
बेद ज्ञान और तप करके,
हरि के हाथों मरते थे।

इसां जानवर जो बनते
इनका बध करो अब तुम बाला।
उठो चलो तलवार उठाओ,
झांसी चण्डी हो तुम बाला।

 

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